On Hindi-Urdu novelist Balwant Singh

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उपन्यासकार बलवंत सिंह
चमन लाल

बलवंत सिंह हिन्दी और उर्दू के अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक है। एक उपन्यासकार के रूप में उनकी अनेक रचनाएं खास मुकाम रखती हैं। बलवंत सिंह ने प्रेमचंद, सुदर्षन और उपेन्द्रनाथ अष्क की परंपरा पर चलते हुए उर्दू में लेखन से शुरूआत की व बाद में हिंदी में लिखने लगे, हिन्दी में बलवंत सिंह के उपन्यास व कहानियां हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ प्रकाषकों द्वारा छापी गई हैं, तो भी हिन्दी में बलवंत सिंह के कथा-साहित्य पर जितनी चर्चा होनी चाहिए थी वह नहीं हुई, उर्दू में अलबत्ता उनको ज़रूर कुछ महत्व दिया गया है।
बलवंत सिंह ने यद्यपि बासठ वर्ष का कम जीवन जिया और उनका लेखन करीब बीस वर्ष की आयु से शुरू होकर जीवन के अंत तक चला यानि करीब चार दषकों तक उन्होंने जम कर लेखन किया, इन चार दषकों में उनकी साढ़े तीन सौ से अधिक कहानियां, बीस उपन्यास, अमृताप्रीतम पर मोनोग्राफ व कुछ अन्य रचनाएं प्रकाषित हुई। लेकिन एक तो वे थोड़े ’इंट्रोवर्ट‘ किस्म की शख्सियत रखते थे, दूसरे व्यक्तिगत जीवन की कुछ पेचीदगियों से व अंततः काले मोतियाबिंद की तकलीफ और उसका उचित इलाज न हो जाने से वे टूटते चले गए और 27 मई 1986 को वे सबको अलविदा कह गए।
बलवंत सिंह की रचनाओं की संख्या तो काफी ज्यादा है, लेकिन उनकी ख्याति को बरकारार रखने वाली रचनाओं का ताल्लुक पंजाब के जन-जीवन से है। बीस में से उनके पांच ऐसे उपन्यास हैं, जो पंजाब के जनजीवन, खासतौर पर ग्रामीण पंजाब के जीवन को उसके बहुरंगे और जीवंत रूप में प्रस्तुत करने वाले हैं। उनकी साढ़े तीन सौ कहानियों में से वही कहानियां अधिक चर्चित हुई हैं, जिनके केन्द्र में पंजाबी चरित्र या पंजाब का जीवन हो, जैसे ’ग्रंथी‘, ’काली तित्तरी‘ आदि।
पंजाब के जनजीवन को केन्द्र में रखकर बलवंत सिंह उपन्यासों की रचना की है, वे हैंः
क. रात, चोर और चांद
ख. दो अकालगढ़
ग. काले कोस
घ. चक्क पीरा कां जस्सा
ड. रावी पार
इन उपन्यासों के वर्तमान प्रकाषित संस्करणों पर इन उपन्यासों के प्रथम प्रकाषन का उल्लेख नहीं मिलता, जिनसे उपन्यासों के प्रथम प्रकाषन का कुछ पता नहीं चलता, लेकिन कुछ संदर्भो से लगता है कि इनमें ’रात-चोर और चांद‘ सबसे पहले 1950-55 के बीच प्रकाषित हुआ, जिसके बाद 1960 के आस-पास ’काले कोस‘ प्रकाषित हुआ। ’दो अकालगढ़‘ संभवतः पहली बार 1969 में छपा व ’चक्क पीरां का जस्सा 1977 में पहली बार छपा। ’रावी पार‘ जो कि अपेक्षाकृत छोटा उपन्यास है, का प्रथम प्रकाषन 1970 के आसपास हुआ। इन सभी उपन्यासों में विभाजन पूर्व के पंजाब, जिनमें लाहौेर, शेखपुरा, गुजरांवाला ज़िले के गावों के चित्र अधिक उभरकर आते हैं।
यह दिलचस्प है कि विभाजन के बाद बलवंत सिंह यद्यपि कुछ समय भारतीय पंजाब में रहे, लेकिन उन्हे इधर का पंजाब किसी भी रूप में आकर्षित नहीं कर पाया। पटियाला आदि जगहों का ’काले कोस‘ आदि उपन्यासों में यदि वर्णन आया भी है तो शेखूपुरा, गुजरांवाला आदि जिलों में बलवंत सिंह का दिल बसा है, और उनके उपन्यासों में उसी सांझी संस्कृति की धड़कन सजीव हुई है, जो 1947 से पहले इन जगहों पर मौजूद थी। वास्तव में विभाजन पूर्व पंजाब के जन जीवन के जैसे जीवंत चित्र बलवंत सिंह ने अपने उपन्यासों में प्रस्तुत किए हैं, ऐसे चित्र न तो पंजाबी (पूर्वी व पश्चिमी दोनों पंजाबों में पंजाबी भाषी लेखक) उपन्यासों में मिलते हैं और न ही शायद उर्दू के ही उपन्यासों में, अंग्रेजी के उपन्यासों चमन नाहल, मुल्कराज आनंद या खुषवंत सिंह आदि की रचनाओं में तो यह चित्रण और भी कमजोर है। इन दोनों (भारतीय व पाकिस्तानी) पंजाबों के राजनीतिज्ञों, लेखकों व लोगों में जो गलबहियां आज पड़ रही है, उसको मद्देनजर बलवंत सिंह के इन पांच उपन्यासों का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इन उपन्यासों के हिन्दू सिख व मुसलमान किरदार अपने साझे जीवन में असली गलबहियां डाल कर ही रहते थे और उन्हें अपनी गलबहियों का आज के नेताओं की तरह प्रदर्षन नहीं करना पड़ता था।
बलवंत सिंह के पंजाब से संबंधित उपन्यासों में ’रात चोर और चांद‘ पर ही पहले चर्चा उपयुक्त होनी चाहिए। संभवतः इस कड़ी में यह उनका पहला उपन्यास है और इस उपन्यास में उनकी कला का अद्भुत रूप प्रकट हुआ है। उपन्यास के आकर्षक शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है कि बलवंत सिंह के मन में बसा पंजाब (और यथार्थ में भी) बड़ा रोमांटिक स्थल है। यह उपन्यास कृष्णा सोबती को समर्पित है, जो उन दिनों कथाकार के रूप में और विशेषतः पंजाब के जनजीवन को स्त्री-दृष्टि से उघाड़ने वाली कथाकार के रूप में प्रतिष्ठा पा रहीं थी। प्रतिष्ठित कथाकार व आलोचक दूधनाथ सिंह ने इस रचना के बलवंत सिंह की श्रेष्ठतम रचना माना है ओर 1977 में इसके पुनः प्रकाशन को एक घटना करार दिया है। इस उपन्यास पर दूधनाथ सिंह की संक्षिप्त टिप्पणी पूरे रूप में जानना ही उपयोगी है।
”रात, चोर और चांद‘ प्रसिद्ध कथाकार बलवंत सिंह की श्रेष्ठतम रचना है। बलवंत सिंह हिन्दी के पहले आंचलिक उपन्यासकार हैं जिन्होंने विभाजनपूर्व पंजाब के जनजीवन को अपने इस उपन्यास में साकार कर लिया है। पंजाब के गांवों की ठेठ जिंदगी का ठाठ इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है। चरित्रों की मनोवैज्ञानिक गहराइयों का अनायास चित्रण बलवंत सिंह को एक अद्भुत शैलीकार के रूप में प्रस्तुत करता है।
’रात चोर और चांद‘ का शिल्प गठन बाहरी तौर पर सीधा सादा और विवरणात्मक दिखाई देता है लेकिन उसके भीतर एक सधे हुए हाथ की नफीस तराश झलक मारती है। उपन्यास की भाषा एक निराली व्यंग्यात्मक शक्ति लिए हुए हैं। बाहरी विवरणात्मकता के भीतर एक गहरा अर्थ और संकेत हर जगह पाठक को नजर आएगा।
इस उपन्यास का पुनः प्रकाषन हिन्दी उपन्यास क्षेत्र में एक घटना मानी जाएगी, क्योंकि इससे आंचलिक उपन्यास के इतिहास का पुनर्लेखन संभव होगा।“ (दूधनाथ सिंह, ’रात चोर और चांद‘, 1977 संस्करण, लोकभारती, इलाहाबाद),
उपन्यास के आरंभ में बलवंत सिंह ने पंजाब के एक प्रसिद्ध लोकगीत का मुखड़ा दिया है।
काला तित्तर चरी विच बोले
उड्डदे नूं बाज पै गए
इसी टुकड़े को दूसरे रूप में भी सुना जाता है-
काली तित्तरी चरी विच बोले
उड्डदी नूं बाज़ पै गिआ।
चरी यानि पशुओं का चारा बाकी अर्थ लगभग स्पष्ट है, लेकिन इन दो रूपों में फर्क है, काली तित्तरी अर्थात, सुदर लड़की के प्रतीक रूप् में, जिसे बाज अर्थात् धाकड़ आदमी जिसके पीछे पड़ जाता है। पंजाब में आमतौर पर इसका यही अर्थ लिया जाता है।
चार सौ पृष्ठ का यह लंबा उपन्यास 17 अध्यायों में बंटा है, जिसके लंबे आमुख में कथा की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गई है।
उपन्यास का केंद्रीय पात्र पाला सिंह छः-सात वर्ष के कलकत्ता प्रवास, जिसमें उसने जेल भी काटी ओर मोटर ड्राइवरी के साथ दादागिरी भी की, अपने गांव डिंगा लौट कर आया है। लंबे तगड़े इस नौजवान के हाथ में लठ है, अपने बाबा की जर्जर समाधि पर पहुंचता है। लौटते हुए उसे बचपन की यादें आने लगती है, जिनसे कथा का पूर्व रूप भी पता चलता है। जब पाठशालाओं में इतवार को भी छुटटी मिलती थी, जहां पर सुबह मंुह अंधेरे जाकर सूरज डूबने पर ही लौटना होता था और निर्दयी मुंशी (मास्टर) की मार झेलनी पड़ती थी। गांव में धर्मषाला, रहट व जौहड़ का उल्लेख भी है।
उपन्यासकार यद्यपि किसी विचारधारा से जुड़ा नहीं है तो भी यथार्थ के उसके पर्यवेक्षन में ही गांव की वर्गीय पृष्ठभूमि भी उघड़ आती है, नंबरदार, पटवारी, साहूकार और उसके संगी साथी गांव के विशिष्टजन है, जबकि बाकी मेहनतकष लोग जनसाधारण की कोटि में आते हैं। धर्मशाला केवल विशिष्ट जनों के लिए है और गांव की एकमात्र कुर्सी जब दारोगा आता है तो उसके लिए निकाली जाती है। बलवंत सिंह के चित्रित गांवों का समय 1930-40 के आसपास का है। उस समय गांव क लेखकों के खेल थे – गिल्ली डंडा, खिद्दोखुंडी (गेंद और लाठी), आंख मिचैनी, कबडडी आदि। पाले को बचपन की परिचित सरनों या शरनकौर की याद आ रही है। गांव पहुंचने से पहले यह नहाने के लिए जौहड (छप्पर) में उतरा तो तीन आदमियों ने उसे घेरकर पैसे छीने। वह तीनों उसके बचपन के परिचित हैं, जिन्होंने उसे नहीं पहचाना था। वे पाले की ताकत को नहीं जानते थे, पाले ने उन्हें ठोंक कर, पहचान बताई ओर फिर घर पहुंचा।
आमुख में इस पृष्ठभूमि को देने के बाद अध्याय एक से उपन्यास के आरंभ में डिंगा गांव की विशेष्ताएं बताई गई है। डिंगा का अर्थ ही ंिबंगा यानि टेढ़ा होता है। यह ऐसा गांव है, जिसने पंजाब में सिख या खालसा राज के खातमे को भी नहीं माना ओर न ही फिरंगी अंग्रेज के राज के स्थापित होने को। अंग्रेज सरकार ने गांव में स्टेशन बनाने की बहुत कोशिशों की। उस सिलसिले में कई कत्ल हो गए, पर गांव वालों ने स्टेषन नहीं बनने दिया – ’एत्थे स्टेषन न बनया फिरंगिया/लंदन दी कुर्सी हिल्ल जाऊंगी। (पृ.28)
गांव में हिंदू सिख और मुसलमान – तीनों की मिश्रित आबादी मिलजुल कर रहती है। करीब चालीस प्रतिशत सिख आबादी है। पाला सिंह का परिवार कभी जमीनों वाला था और दबदबा रखता था। आर्थिक मंदहाली आने पर डाकेजनी का पेषा अपना लिया। जमीन मुकदमेबाजी में लुट गई, बाप फांसी पर चढ़ गया। बची खुची जमीन बड़े लड़के लहना सिंह के नाम कर, छोटा पाला बचपन में ही कलकता भाग गया था। उसकी मां सिंदों बड़ी हथछुट्ट मानी जाती थी। एक बार लड़के से कलकता जाकर मिल भी आई थी। पाला जेल गया तो घर पर खत भिजवा दिया कि फौज में भर्ती होकर बर्मा चला गया है। पाले के लौटने पर मां ओर उसकी भाभी ताबां (लहने की घरवाली) खूब खुश होती हैं, क्योंकि घर में रौनक हो गई है।
गांव में ही निरंजन सिंह के परिवार में पत्नी जिंदा और बेटी सरनों है। जिंदा और सिंदा सहेलियां भी रही है। निरंजन सिंह ने प्रथम विश्व युद्ध में ठेकेदारी से कमाई की है, सो वह पैसेवाला है। जाटों की लड़कियां तब भी 22-24 वर्ष की उम्र तक कुंवारी रह जाती थीं। पाला अब गांव लौटा है तो कलकते में बाजारू औरतों से संबंध रखने के बाद भी उसके मन में सरनों के लिए कोमल भावना है।
उधर गांव में ही जरायमपेशा और रीछ जैसे बदन वाले ज्वाला सिंह बगीची का मालिक है। वह गांव से बाहर रहता है, उसने शादी नहीं की, पर रिश्ते की ’बहिन‘ चिंतो उसके साथ रहती है। चिंतों भी जरायमपेशा है, शराब पीती और डकैतियों में बंदूक लेकर हिस्सा लेती है, ज्वाला पचास के करीब है और चिंतों चालीस के। उसका घर अपराधियों का डेरा है, जहां असलाह वगैरा भी रहता है, पाले को यह टोला भी आकर्षित करता है। पाले का बापू, संता सिंह, ज्वाला के जरायम टोले में उसका साथी था।
गांव की चैपाल के नायक है – हरप्रसाद पंडित और बूढ़ा कर्मदीन, जिनमें दुनिया के तजुर्बो व उनसे हासिल सयानप की स्पद्र्धा लगी रहती है। दोनों हमउम्र्रो में नोंक झोंक चलती रहती ।
गांव में दीनों लुहार की दुकान छोकरों का क्लब थी, जहां खूब चस्के लेकर गपशप होती थी, पाला यहां भी हीरो बना।
पाले ने भाभी ताबां के जरिए सरनों तक पहुंच करने की कोशिश की। एक दिन अकेले में सरनों को आलिंगन में लिया तो नवाब ने देखा, जो सरनो की अब शादी शुदा सहेली स्त्री का प्रेमी था।
दीवाली का मेला देखने पाला और निरंजन सिंह परिवार अमृतसर गए तो लफ्टैन पृथ्वीपाल के यहां रहे जिससे पाले को सरनो संबंधी चिंता हुई कि वह सरनो से शादी न कर ले।
ज्वाला के यहां अपराधी गिरोह की महफिल में प्यारो पाले से आंख मटका लड़ाने लगी तो शराबी मित्त सिंह ने हमला किया, पाले ने उसे पटक कर बाहर फेंक दिया। इस गिरोह ने 16 आदमी लेकर दूसरे गांव में साहूकार के धर डाका डाला तो उल्टा पड़ा – ये समझे कि साहूकार के घर बंदूक नहीं है, लेकिन वहां से बंदूक भी चली और डकैत सरदार जैल सिंह भी मारा गया, कलाल भेदिया भी और कुछ और जिनके सिर बाकी बचे डकैतों ने काटे, पाले को चिंतो ने बचाया, पर उसने छोटा सेठ उड़ा दिया।
उधर सरनो के पास से पृथ्वीपाल की चिटठी मिलने से घर में शोर मचा, उसकी मां ने उसे बहुत मारा। उसकी शादी दुहाजू (रंडवे) हवलदार से तय कर दी गई। आखिर तक कुछ हो जाने की उम्मीद रख पाले ने भी शादी में हिस्सा लिया। पृथ्वीपाल को अकेले में मिलने पर पाले ने बहुत मारा, दोनों गांवो में लड़ाई हुई -ज्वाले ने पृथ्वीपाल के घर हमला किया। पाला जान से बचा, पर मुकदमेबाजी में कैद हुई। कैद से छूटकर सरनों से मिलने लुधियाना गया, वो अब एक बच्चे की मां थी। उसका आदमी ड्यूटी पर गया था वहां पाला बेकाबू हआ और सरनो के मना करते-करते जबरदस्ती संबंध बना डाले। सरनो ने नफरत में बलात्कारी कहा तो पाले के इन शब्दों से उपन्यास समाप्त होता है – ’उंह साली, उल्लू की पट्ठी।‘
एक दिलचस्प कथा का अंत एंटी-क्लाइमेक्स के रूप में होता है, जहां पर धाकड़ पंजाबी किरदार में आदिम वृति जागती है और वह सभ्यता का तमाम विकास नकार कर बलात्कार के स्तर पर उतर आता है। उसके मन में इसका खास अफसोस भी नहीं होता, हालांकि उस स्त्री के लिए वह अपनी जान भी दे सकता था।
पाले का किरदार एक तरह से एक आयामी किरदार है, लेकिन यही इस किरदार का यथार्थ है। पृथ्वीपाल द्वारा अपनी प्रेमिका से धोखे का बदला वह लगभग प्राणघातक रूप में लेता है, जिसमें उसका प्रतिद्धन्दी भी मर सकता था और वह भी। घातक रूप से घायल दोनो होते भी हैं। और वही पाला सरनो को घर में अकेली पाकर, जब सरनो इस बात से खुश है कि उसने पृथ्वीपाल को मारा, तो वर्षों से दबी सरनों को पाने की उसकी इच्छा इस हद तक बेकाबू होती है कि वह उससे बलात्कार करने की हद तक चला जाता है। सरनो उसके प्रति गुस्से से नफरत का इज़हार तो करती है, पर हवलदार पति होकर भी उसे पकड़वाने की कोशिश नहीं करती, इसलिए दोनों का प्रेम संबंध एक खास तरह की जटिलता लिए हुए है, जिसमें सामंती व्यवस्था और सामाजिक मूल्यों के दबाव भी शामिल है।
बलवंत सिंह ने पंजाबी जाटों के किरदार वाले अपने इस पहले उपन्यास में पाले के रूप में एक अपरिकृत किरदार, एक आदिम वृति के पुरूष किरदार रूप में प्रस्तुत किया है। पंजाब की जन-संस्कृति उस समय आदिम मूल्यों से संघर्ष कर सभ्य समाज व सांस्कृतिक रूपांतरण की प्रक्रिया से गुज़र रही थी। पंजाब का यह जनजीवन आदिवासी समाज की तरह हिंसक था, पंजाबी जाटों में जरायम की प्रवृति व्यापक नहीं, छिटपुट थी, जैसे पाले की पृष्ठभूमि में भी किसान के उजड़ने के बाद जरायम पेशा यानि डाकेज़नी में पड़ने का उल्लेख है, जाहिर है तमाम किसान या जाट अपराधी प्रवृति के नहीं थे। लेकिन शारीरिक पुष्टता और बहादुरी उनमें थी, जो उनके कबड्डी जैसे खेलों में भी झलकती है। स्त्री के प्रति आकर्षण तो हर समाज में, हर दौर में रहता ही है, सो पंजाब में हीर या सोहनी की लोकथाएं इसी से पैदा हुई है।
बलवंत सिंह ने शारीरिक पुष्टता या बहादुरी का एक अंजाम पुरूष द्वारा स्त्री के बलात्कार रूप में दिखाकर समाज के एक खास दौर में असभ्य व्यवहार के यथार्थ निरूपण में किया है। लेकिन उपन्यास के सकारात्मक पहलू भी कम नहीं है – गांव के जीवन का समाजशास्त्रीय पर्यवेक्षण, विशिष्ट और साधारण, सांप्रदायिक सद्भाव आदि के चित्रण में ये पहलू सशक्त रूप से उभरे हैं।
बलवंत सिंह के उपन्यासों में विभाजनपूर्व पंजाब का रोमांस भरा चित्रण है। ’रात, चोर और चांद‘ या ’रावी पार‘ में डकैतियां और स्त्री आकर्षण केन्द्र में है, जबकि अन्य उपन्यासों में डकैतियां और स्त्री आकर्षण की कथाएं व्यापक सरोकारों के चित्रण के साथ चित्रित हुई है। अपने अगले उपन्यासों में बलवंत सिंह पाले जैसे धाकड़ किरदारों में बलात्कार जैसे प्रवृतियों को नियंत्रित कर अर्थात उनका सांस्कृतिकरण ओर मानवीकरण करते हैं, इस प्रसंग में ऐसे ही दूसरे लेकिन छोटे उपन्यास रावी पार की भी चर्चा की जा सकती है।
1980 में राजकमल से संभवतः पुनः प्रकाशित, प्रथमतः 1960-70 के बीच प्रकाशित ’रावी पार‘ करीब डेढ़ सौ पृष्ठ का अपेक्षाकृत छोटा उपन्यास है, जिसमें दस अध्याय और ’चब्बा‘, शीर्षक पृष्ठभूमि है। यह उपन्यास शशिप्रभा (शास्त्री) को समर्पित है और उपन्यास में रावी नदी के करीब चब्बा गांव को कथा का आधार बनाया है, जो शहरों से घिरा है, जिसमें देवी दा छप्पड़ (तालाब) है, कल्लरवाला (ऊसर) जमीन, कबड्डी और सांेंची के खोल है। गांव में सरदार काबला सिंह है, जो खूब लंबा तगड़ा है, उसके पास भूटिया कुता है। गांव के जवान लड़के बागड़ सिंह ने जवानी के जोश में भूटिया कुते कुते को घुमा कर फेंका और उसकी टांग तोड़ दी। काबला सिंह ने बागड़ सिंह को बुलाकर वही सुलूक उसके साथ किया, जो उसने कुत्ते के साथ किया था। बाद में घी-दूध भेज उसका स्वास्थ्य बनाया, उसकी अंडबैंग निकाल कर अपना फातिमा बनाया, सो दो धाकड़ों का इलाके में दबदबा। काबला सिंह की लाडली बेटी सुरजीत जवान हुई, फातिमा उसकी सहेली, लोकगीतों में लड़कियों के रस भरे चटखारे। काबला सिंह की दो भूरी भैंसे चोरी हुई, ननकाना साहब के वैषाखी मेले का चित्रण, लड़कियां भी गई। काबला सिंह की काली घोड़ी रावी पार के गब्बरू सुजान सिंह ने भगाई, जो सुरजीत पर आशिक भी हुआ। बागड़ से उसने घोड़ी की चोरी मानी। दस दिन बाद घोड़ी लेकर चला आया, ईनाम की रकम ली, चोर पकड़वाने वाली रकम लेकर बताया कि चोरी उसी ने की। काबला सिंह उसकी हिम्मत से दंग, लेकिन सुरजीत का रिश्ता उसके करना मान लिया। बागड़ सिंह की जान में जान आई।
’रावी पार‘ एक रोमांटिक कथा के रूप में रचा गया साधारण उपन्यास है, जो पंजाबी धाकड़पने पर केन्द्रित है। उपन्यास के तीनों प्रमुख पात्र – काबला, बागड़ और सुजान धाकड़ हैं -तीनों अपने शारीरिक बल का प्रदर्षन करते हैं ओर तीनों ही एक दूसरे के धाकड़पन की प्रशंसा भी करते हैं। तीनों ही बेखौफ हैं, मारने और मार खाने के डर से पूरी तरह मुक्त। बागड़ जवानी में काबला सिंह से पंगा लेकर भयानक मार खाता है और फिर सारी उम्र उसका वफादार कारिंदा बना रहता है। सुजान सिंह उससे भी दो कदम आगे साबित होता है, वह काबला सिंह की घोड़ी भी चुराता है, उसकी बेटी का रिष्ता भी चाहता है, और सीधा ही बिना खौफ उसके सामने पेश भी हो जाता है। काबला सिंह भी उसकी बहादुरी व निडरता का कायल होकर अपनी बेटी का रिश्ता उससे करने पर राजी हो जाता है।
विभाजन पूर्व पंजाब के ग्रामीण जाट किरदारों से रोमांटिक चित्र खींचने वाला यह उपन्यास यथार्थ भी है और दिलचस्प भी। ’रात, चोर और चांद‘ की परंपरा के ही इस उपन्यास में बलवंत सिंह ने वीरता के साथ नैतिकता का पुट दे दिया है – सुजान सिंह न तो सुरजीत को भगाता है, न उसके साथ बदसलूकी करता है – वह चोरियां भी करता है, पर अपराधी वृति से नहीं, जवानी के जोर और शौक पूरा करने को करता है। कुल मिलाकर लघु आकार में ही बलवंत सिंह ने इस उपन्यास में पंजाब का जीवंत चित्र प्रस्तुत कर दिया है।
’दो अकालगढ़‘ उपन्यास पंजाब से जुड़ी रचनाओं में सबसे दीर्घ कृति है। 1983 में प्रकाशित इसके दूसरे संस्करण में इसके 624 पृष्ठ हैं, जो बीस मुख्य अध्यायों के अंतर्गत छोटे अध्यायों में विभाजित है। यह उपन्यास भी शशिप्रभा शास्त्री को ही समर्पित है। इस उपन्यास को सिख जीवन का महाकाव्य भी कहा गया है और यह भी कहा गया है कि ’पंजाब के जीवन की ऐसी चटख और मद्धम रंगोरंग की गुलकारी केवल बलवंत सिंह में ही पायी जाती है।‘
उपन्यास के अंत में नायक दीदार सिंह से कहलवाई पंजाबी लोकगीत की पंक्तियां दर्ज है – मैं मल्ल लां तख्त लाहौर दा/मैं खोह लां राजे दियां रानियां।‘
इन पंक्तियों का संदर्भ पंजाब के बागी नायक दुल्ला भट्टी से जुड़ा है। दुल्ला भट्टी पंजाब की जन संस्कृति की रग-रग में बसा है। लोहड़ी के गीतों में दुल्ला है गांव के किस्सों में भी। दुल्ला व्यवस्था से बागी नायक है – मध्यकाल का। पाकिस्तानी पंजाब में अभी भी दुल्ला भटटी की लोककथा जन-जन में बसी हुई है और भगत सिंह को वहां दुल्ला भटटी की परंपरा का नायक माना जाता है।
बलवंत सिंह ने अपना नायक दीदार सिंह भी दुल्ला भटटी की तर्ज पर गाढ़ा प्रतीत होता है। अपनी कथा शैली के विशिष्ट अंदाज के अनुसार इस उपन्यास में भी अध्यायों के पहले ’दीदार सिंह‘ शीर्षक से उपन्यास की कथा की पृष्ठभूमि बता दी गई है। इस उपन्यास में बलवंत सिंह की कथा बयान करने की नैरेटिव शैली अपने शिखर रूप में विकसित हुई हैं। साथ ही उपन्यास में सहजस्फूर्त रूप में समाज का वर्गीय परिप्रेक्ष्य भी उघड़ आता है।
नायक दीदार सिंह की कहानी शुरू करने से पहले उपन्यासकार उसकी वीरता की पृष्ठभूमि व्यक्त करने के लिए चैदह वर्षीय स्कूल छात्र बकरी सिंह के छुटिटयों में अपने घर के लिए चल पड़ने, रास्ता भटक जाने, साइकिल पंक्चर हो जाने व रात में घिर जाने पर सांडनी सवार दीदार सिंह के द्वारा उसे शरण में लेकर, उसे घर तक पहुंचाने का विवरण दिया है। रास्ते में वह उसे भेड़ियों की कहानियां सुनाता हुआ बाबा मित्त सिंह के मेले पर ऊंटनी के दूध सहित कुछ और भी खिलाता पिलाता है। मेले पर ही नायक दीदार सिंह अपनी पे्रमिका रूपी से भी मिलता है।
’दो अकालगढ़‘ उच्चे और नींवे अकालगढ़ में बंटा है। ऊंचे अकालगढ़ में निम्न लोग यानि कम्मी, मजदूर, गरीब किसान आदि रहते हैं ओर नींचे अकालगढ़ में ऊंचे लोग अर्थात जमींदार आदि रहते हैं। यह बार का इलाका है और धाकड़ लोगों का गढ़ है। हिन्दू, सिख और मुसलमान सभी मिलकर रहते हैं। गांव सिखों के कहे हैं। ज़मीनें भी उन्हीं की है। आपसी माहौल सद्भावपूर्ण है, गुरूद्वारे और मस्जिदें बने हैंैैै। गुरूद्वारा अकालियों का गढ़ है। गांव में सरकारी मिडिल स्कूल है, जिसके हेडमास्टर टेक चंद राष्ट्रवादी विचारें के हैं। ऊंचे अकालगढ़ में नत्था सिंह धाकड़ अपने चार बेटों, गज्जन, दीदार, बंता और तेजा के साथ रहता है। खानदान पूरा भूतों जैसा है।
नीवें अकालगढ़ में जमींदार गुलज़ारा सिंह रहता है, फिल्लोरा सिंह उसका छोटा भाई है। नत्था सिंह से इस परिवार की खानदानी दुश्मनी है, वे नत्था सिंह को निम्न जाति अर्थात ’मजहबी‘ ’सिकलीगर‘ समझते हैं। नत्था सिंह के चारों बेटों में दीदार सिंह सबसे अधिक तगड़ा है। वह गुलजारा सिंह की बेटी रूपी से प्रेम करने लगता है। बारिश में आटे की चक्की पर उससे आलिंगन करने का पंगा भी वह ले लेता है।
गांवों में होने वाले कत्लों के सिलसिले में गुलज़ारा सिंह के कारिंदे नाहर के बाप का कत्ल नत्था सिंह ने किया है। वह नाहर बदला चुकाने के लिए नत्थे की बेटी अमरो को अपने जाल में फंसाना चाहता है। साजिशें चलती रहती हैं। यह मूक फिल्मों का दोर हैं। 1930 के आसपास सुलोचना और माधुरी की फिल्मों की चर्चा है। रूपी ननिहाल जाती है तो वहां भी दीदार से जा मिलती है। गांव में अंग्रेज अफ्सर (लाट साहिब) के दौरे पर गर्मी में स्कूली बच्चें की इंतजार में बुरी हालत कर दी जाती है। हेडमास्टर टेकचंद 1845 की मुदकी की सिख-अंग्रेज लड़ाई का विवरण सिख पक्ष की दृष्टि से देता है। सिख अंगे्रज लड़ाइयों का जिक्र करते हुए हेडमास्टर कनिंघम के सिख इतिहास से हवाले देता है।
गज्जन सिंह की शादी बचपन में ही हो जाती है। जवान होकर बहू तारो को लेने जाता है और रास्ते में ही अपने दुश्मन को रनजोध को पुलिस के हाथों से छुड़ाकर खुद मार डालता है और पुलिस के जाल से बच भागता है। पड़ोस के गांव में नाहर और तेजे की झड़प हो जाती है। दीदार से छोटा बंता गुजरात में तवायफ जानकी को गांव लाकर तबेले में रहता है, घर में उसे स्वीकार नहीं किया जाता और दीदार जानकी को शहर भेज देता है – बंता भी पीछे ही चला जाता है।
उपन्यास में दलित संदर्भ की झलक भी है। गुलजारा सिंह का नत्था सिंह परिवार को निम्न जाति समझना, टेकचंद का गांधी के अछूतोद्वार कार्यक्रम का उल्लेख करने के क्रम में इसकी झलक मिलती है।
उपन्यास की कथा का हर पहलू रोचकता से भरा है। फिल्लौरा सिंह आदि गज्जन को फंसाने के लिए राजो वेष्या और उसकी बेटी शीलो को गांव ले आते है, जिनको दीदार ही वापिस भेजता है। दीदार अपने दोस्त बूटे की शादी उसकी प्रेमिका से करवा देता है। नाहर अमरो को भगाना तो चाहता है, पर उससे शादी से इन्कार करता है। नत्था सिंह उसका कत्ल इस तरीके से करता है कि पुलिस उसका बाल भी बांका नहीं कर पाती। नत्था सिंह अपने चारों बेटों के साथ अब चढ़त में है। वह सरदारों को गांव छोड़ने का आदेष दे देते हैं। फिल्लौरा मुकाबले को तैयार होता है। लेकिन गुलजार के कहने से सभी गांव छोड़ चल पड़ते हैं। दीदार रूपी को ले जाता है तो अगले दिन गुलजार सिंह आदि गांव लौट आते हैं।
यह उपन्यास अत्यंत रोचक है और कथारस से भरपूर है। नत्था सिंह का जेल में शहीद भगत सिंह से मिलने का भी जिक्र है। उपन्यास मई 1931 पर जाकर समाप्त होता है। उपन्यास में 1930-31 के पंजाब का बड़ा ही यथार्थ अंकन हुआ है। हालांकि उपन्यास का मुख्य स्वर रोमांटिक है, लेकिन उपन्यास में सहज ढ़ग से सामाजिक ऐतिहासिक संदर्भ व वर्गीय विष्लेषण भी मिलता है। उपन्यास उपनिवेषवाद विरोधी राष्ट्रवादी विचारों का वोहक भी है। उपन्यास भले ही आजादी के पंद्रह वर्ष बाद लिखा है, लेकिन इसमें तीव्र राष्ट्रीय भावनाओं का अंकन हुआ है।
कुल मिलाकर ’दो अकालगढ़‘ बलवंत सिंह के उपन्यासों में एक विषेष स्थान का अधिकारी उपन्यास है। यह उपन्यास सिर्फ एक रोमांटिक रचना ही नहीं, सामाजिक-ऐतिहासिक यथार्थ के चित्रण और निम्न वर्गों के साथ अपनी पक्षधरता के कारण भी बहुत भावपूर्ण रचना है। लेखक ने बिना किसी वैचारिक आग्रह के साथ, स्वयं अपने जीवन अनुभवों से उच्च वर्ग के खोखलेपन व दम तथा निम्न वर्ग के जीवन में अधिक अर्थवत्ता को चित्रित किया है। एक लेखक के स्तर पर यह एक बड़ी उपलब्धि है।
इसी कड़ी में बलवंत सिंह का अगला उपन्यास है – ’चक्क पीरां का जस्सा‘, जिसके प्रकाषन वर्ष की सही सूचना उपलब्ध है और उपन्यास में दर्ज है यानि इस उपन्यास का प्रथम संस्करण छपा 1977 में, बलवंत सिंह का यह उपन्यास भी दीर्घाकार यानि साढ़े चार सौ पृष्ठ का है, जिसमें बारह अध्यायों के साथ प्राक्कथन भी है। इस उपन्यास में पंजाब के मध्यकाल के भी व पूरे पंजाबी साहित्य के भी सर्वाधिक लोकप्रिय कवि वारिस से हर अध्याय के शुरू में उद्धरण दिए हैं। हीर की पंक्तियां हर जवान व बड़ी उम्र के पंजाबी के भी ओंठों पर थिरकती रहती है और पंजाब में रोमांस की परंपरा का सर्वश्रेष्ठ सर्वप्रिय कवि वारिस शाह ही है। पंजाब की सभी प्रेम कथाओं में कहीं न कहीं वारिस की हीर का प्रभाव देखा जा सकता है। बलवंत सिंह पंजाब की जन संस्कृति, विषेषतः रोमांस की संस्कृति में इतने गहरे पगे हुए थे कि वारिस शाह को उनका अपने रोमांटिक उपन्यासों के संदर्भ में न याद करना विचित्र होता। 1947 के भयानक दुखांत के समय अमृता प्रीतम ने भी वारिसषाह को ही याद किया था – ’अज्ज आखां वारिस शाह नू, कितों कब्रां विचों बोल। इस कविता व अमृता प्रीतम की कुछ और चुनींदा कविताओं का अनुवाद भी बलवंत सिंह ने अमृता प्रीतम पर अपने मोनोग्राफ में किया है।
’चक्का पीरां का जस्सा‘ उपन्यास में बलवंत सिंह की कथाषैली फिर अपने सबसे प्रभावी रूप में व्यक्त हुई है। उपन्यास की कथा पिछले उपन्यासों जैसी ही है – पंजाब के गांवों के धाकड़ व बलषाली जाटों का अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्षन, लेकिन बलवंत सिंह साधारण लगने वाली कथा को भी अपनी कथाषैली द्वारा चामत्कारिक रूप से आकर्षक बना कर प्रस्तुत करते हैं, जो इस उपन्यास में भी हुआ है।
उपन्यास में चाचे -भतीजे के परस्पर प्रेम व घृणा तथा भतीजे जस्से की अपनी प्रेमकथा को अद्भुत रूप में बयान किया गया हैं। विभाजन पूर्व पंजाव के शेखपुरा ज़िले के हरिपुरा गांव में सज्जन सिंह – मथुरा देई की बेटी गुरदीप कौर अर्थात दीपी के भाग कर कब्रिस्तान में मुह अंधेरे जाने और छः वर्ष बाद अनाथ बालक से कडियल जवान बन कर लौटे बचपन के मित्र बीस वर्षीय जस्से से मिलने पहुंचती है। दीपी अब स्वयं षोडष वर्षीय अर्थात सोलह वर्ष की है।
उसके बाद उपन्यास की कथा शुरू होती है, बाप के बाद मां के भी मर जाने से अनाथ हुए बालक जस्से को गांव सरदारपुरा से हरिपुरा में भूत जैसे तगड़े उसके चाचा बग्गा सिंह के पास छोड़ने के विवरण से उपन्यास की कथा शुरू होती है। स्वयं प्रकाष की 1984 के बाद प्रकाषित प्रसिद्ध कहानी ’क्या तुमने कोई सरदार भिखारी देखा है?‘ का शीर्षक 1977 के इस उपन्यास में बग्गा सिंह के इन शब्दों में दर्ज है – ”मैंने तो पंजाब में किसी सिख को भीख मांगते नहीं देखा, सिख भिखारी नहीं होते। हां अगर कभी पंजाब खत्म हो गया तो सिख भी भिखारी बन जाएंगे।‘ (चक्क पीरां का जस्सा, पृ. 25) और यह पंजाब भी 1930 के आस-पास का पंजाब है।
बग्गा सिंह के साथ उसकी विधवा बहिन भजनो रहती है। बग्गा सिंह ने शादी नहीं की है, उसको खानदानी जमीन मिलने का तो उल्लेख है, लेकिन भाई बग्गा सिंह के साथ संबंधों का नहीं? उसके भानजे महा सिंह का भी उल्लेख है। बग्गा उजड्ड स्वभाव का है और जस्से का स्वागत वह गालियों व जूड़ा पकड़ कर उसे उल्टा लटकाने में करता है, लेकिन भजनो अच्छे स्वभाव की है व उससे स्नेह कर भीतर ले जाती है। भजनो के पास बनारस से आई स्त्री रामप्यारी आती है, जिसे बग्गा का गांव का शरीक और दुष्मन चन्नण सिंह लाया है ताकि वह बग्गा सिंह को अपने जाल से फंसा कर बर्बाद कर सके और इसमें वह कामयाब भी होता है। गांव में तीन धाकड़ बदमाष है – बग्गा, चन्नण व शेर सिंह। शेर सिंह के बाकी दोनां से अच्छे संबंध हैं, लेकिन बग्गे और चन्नण में रिष्तेदारी होने पर भी आपसी बैर है। इन तीनों में बग्गा मूर्ख, चन्नण मक्कार व शेर सिंह होषियार है और अक्सर वह बग्गे का ही पक्ष लेकर उसे कई दफा मुसीबतों से बचाता है।
गांव में रिटायर्ड हेडक्लर्क बाबू बालमुकुंद भी रहते हैं, वह भी रामप्यारी की अदाओं पर फिदा हुए रहते हैं। रामप्यारी वास्तब मंे वेष्या है, लेकिन गांव में दुखियारी औरत के रूप में पेष होती है और बग्गा उसकी मोहिनी अदाओं के जाल में ऐसा फंसता है कि टूट जाता है। उसे भावनाओं के षिखर पर पहुंचा कर रामप्यारी का ’पति‘ प्यारेलाल आता है और उसे लेकर चलता बनता है। उधर जस्से को बचपन में ही दीपी के प्रति आकर्षित देख बग्गा क्रोध में आकर उसे चक्क पीरां में जमीन की देखभाल के लिए भेज देता है। वहां का नौकर जगीर सिंह जस्से को खिला पिलाकर वर्षों ही दर्षनीय जवान बना देता है।
गांव सें रामप्यारी केजाने के बाद बग्गे और चन्नण गुटों की लड़ाई में हुए कत्ल में बग्गे को फंसा कर पांच साल के लिए कैद करवाया जाता है और कैद से छूट कर रामप्यारी के विष्वासघात से अब तक दुःखी वह गांव छोड़ कर चक्क पीरां चला जाता है और जस्से को हरिपुरा पेज देता है। हरिपुरा आकर जस्से को चन्नण के लड़के छेड़ते हैं तो उनका आतंक तोड़ने के लिए जस्सा उनके पहलवान थुन्ने की सरेआम गर्दन मरोड़ देता है – गांव में खुषी और आतंक दोनों छा जाते हैं। शेर सिंह की मदद से थुन्ने की लाष गायब हो जाती है। और जस्से का बाल भी बांका नहीं होता और गांव में उसकी धाक बैठ जाती है। जस्से से प्रेम के कारण दीपी को उसके घरवाले उसकी मौसी के पास गांव रत्तोके में छोड़ देते हैं। जस्सा वहां पहुंच कर दीपी की मौसी का दिल जीत लेता है। समानांतर ही जस्से के दोस्त पुलिस अफसर पूरन सिंह की कथा चलती है, जिसका पे्रम दीपी की सहेली प्रसिन्नी है और जिसके पीछे सूरत बदमाष लगता है। बग्गे को स्त्री जाति से ही नफरत हो जाती है और जमीनों के वारिस के लिए भजनों के लाख कहने पर भी वह शादी को राजी नहीं होता। पूरन सिंह की एक विधवा बहिन है बंतो।
जस्सा इन सारे अंतर्विरोधों को एक-एक कर सुलझाता है। पहले वह गांव में चन्नण और उसके लड़कों की हालत खराब कर उन्हें किनारे करता है। फिर प्रसिन्नी का पीछा सूरत सिंह से छुड़ा कर पूरन सिंह के प्रसिन्नी से विवाह का रास्ता साफ करता है। सबसे नाटकीय है उसका अपने चाचा बग्गा सिंह को अपने शारीरिक बल से सीधा कर उसका विवाह पूरन सिंह की बहिन बंतो से कर देना और अपना विवाह भी दीपी से करना।
ये सभी घटनाएं लगभग रोमांटिक हिन्दी फिल्मों के सुखांत अंत की तरह घटती हैं, लेकिन इनका बयान करने का ढंग इतना दिलचस्प है कि प्रबुद्ध पाठक को हिन्दी फिल्मों की फूहड़ता पर जैसा गुस्सा आता है, वैसा इस उपन्यास को पढ़ते समय नहीं आता। कारण शायद यह कि लेखक ने इन घटनाओं के केन्द्र में मानवीय सरोकार रखे हैं। बल्कि इस उपन्यास की विषेषता यह है कि इस उपन्यास के कुछ धाकड़ किरदारों में मानवीय मूल्यों के लिए संघर्ष करने की इच्छा विकसित करके बलवंत सिंह ने उन किरदारों का उदात्तीकरण व मानवीकरण किया है। इस मामले में जस्सा, दो अकालगढ़ के दीदार सिंह से आगे बढ़ा हुआ किरदार है, जो गांव में अपनी ताकत का इस्तेमाल बदमाषों की ताकत के बेजा और अन्यायी इस्तेमाल को खत्म करने में करता है। एक तरह से जस्से के किरदार में एक सामाजिक दायित्व की भावना विकसित कर लेखक ने शेर सिंह जैसे धाकड़ किरदार में भी मानवीयता पैदा की है और अपनी पे्रमिका दीपी से विवाह के लिए भी जस्से को बलवंत सिंह के पिछले उपन्यासों के किरदारों की तरह जोर जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती, वरन् दीपी के माता पिता स्वेच्छा से दीपी के उसके साथ रिष्ते के लिए सहमत हो जाते हैं। पंजाब में दो अकालगढ़ के दीदार सिंह को बलवंत सिंह ने लोकनायक दुल्ला भट्टी की तर्ज पर गढ़ना चाहा, लेकिन इसमें ज्यादा कामयाबी उन्हें जस्से को वैसा किरदार बनाने में मिली है, जो एक चुपचाप रहने वाले, लेकिन अन्याय का जोरदार तरीके से पूरी ताकत और सफलता के साथ विरोध करने वाले नायक के रूप में विकसित होता है और जिसे गांव वाले दिल से चाहते और उसका आदर करते हैं।
’चक्क पीरां का जस्सा‘ की कथा में अद्भुत प्रवाह हैं। पूरे उपन्यास में शहर का कोई चित्र नहीं, सिर्फ जिक्र है। पूरे उपन्यास में ग्रामीण परिवेष का ही चित्रण है। 80-85 साल पहले गांवों में विधवा विवाह करवाना एक बड़े रैडिकल सामाजिक मूल्य को स्थापित करना है, जो उन सामंतवादी मूल्यों को चकनाचूर करता है, जो स्त्री को केवल चारदीवारी में बंद देखना चाहते है।
कुल मिलाकर ’चक्क पीरां का जस्सा‘ उपन्यास में बलवंत सिंह अपनी रोमांटिक उपन्यासों की परंपरा का श्रेष्ठ रूप व्यक्त करने में सफल होते हैं। लेकिन इस कडी का उनका सर्वश्रेष्ठ व हिन्दी के श्रेष्ठ उपन्यासों में से एक उपन्यास है ’काले कोस‘।
– ’काले कोस‘ के प्रथम प्रकाषन का उल्लेख भी 1982 के राजकमल संस्करण में नहीं मिलता। संभवतः यह उपन्यास भी पहली बार 1960 के आसपास प्रकाषित हुआ। विभाजन का संदर्भ होने से जितनी इस उपन्यास की चर्चा होनी चाहिए थी, उतनी हुई नहीं, जबकि विभाजन के चित्रण के संदर्भ में ’काले कोस‘ एक महत्वपूर्ण औपन्यासिक रचना है। उपन्यास दीर्घाकार है और तीन खंडों व बीस अध्यायों में बंटा है। इसके तीन खंडों के शीर्षक है – मेला, झमेला और होला हैं। कुछ ऐसे ही उपषीर्षक बाद में पाकिस्तानी पंजाब के पंजाबी लेखक सलीम खां गिम्मी ने विभाजन पर आधारित अपने पंजाबी उपन्यास ‘सांझ‘ में दिए।
उपन्यास के पहले ही पृष्ठों पर सिख धर्म में गुरूद्वारों में या कहीं किसी भोग आदि पर पाठ समाप्ति पर खड़े होकर उच्चरित की जाने वाली पूरी अरदास दर्ज की गई है, जो पूरे तौर पर तो ग्रंथी द्वारा उच्चरित की जाती है, पर बीच-बीच में या अंत में सारी संगत साथ देती है – ’बोलो जी श्री वाहे गुरू‘ आदि।
चार गांव का सरदार पिषौरा सिंह मुरब्बों का मालिक है। उनका एक बेटा शहर में पढ़ता है और बेटी गोविंदी है। गांव का जवान विरसा दंगा, फसाद, डकैती आदि में मस्त रहता है। वह खूब तगड़ा और सुंदर है। सुच्चा सिंह, गीटा, बग्गा साहसी, षिंगारा सिंह, शुर्ली, अल्ला दित्ता अरई आदि उसके साथी हैं। पटियाला इलाके में उसका दोस्त सिराज रहता है। विरसे का बाप बीमार पड़ा है और उसके जमीन पर काम करने वाले दो भाई उसकी देखभाल करते हैं। विरसा उसके अपने शब्दों में ’इज़ारबंद का कच्चा‘ है।
पिषौरा सिंह का बेटा सूरत सिंह विचारों से वामपंथी है और डा. महेन्द्र कौर उसकी दोस्त है। वे लोग गांव में जागृति लाने के लिए काम करना चाहते है।
चारगांव में दो बैठकें प्रसिद्ध है – फुल्लो में पिषौरा सिंह की बैठक और माधचक्क में दिल मुहम्मद का दारा। ये दोनों अमीर लोग एक दूसरे के दोस्त है और एक दूसरे की बैठकों में जाते भी हैं। आठ दिन के फुल्लां वाला मेले में बाजीगर, ठग, चोर, डाकू सब जुड़ते हैं। गांव में विरसा सूफी विचारों के जुलाहे बेली शाह और पिठठू राम हलवाई का आदर करता है।
सूरत सिंह गांव में आकर समाजवादी क्रांतिकारी बातें करता है। चार गांवों की साझी जमीन पर वह साझी खेती की वकालत करता है। उसकी पूंजीवाद और जागीरदारी के खिलाफ की जाती बातें गांव वालों की समझ से परे हैं।। महेन्द्र कौर से उसे पहली नजर में ही मुहब्बत हो गई थी। चारगांव में समाज सुधार के लिए व लोगों से जुड़ने के लिए महेन्द्र कौर डिस्पेंसरी खोलती है। वे झोपड़ियों में रहते हैं। शुरू-षुरू में सब उनका मजाक उड़ाते हैं लेकिन धीरे-धीरे अपने धैर्य व जन सेवा से वे लोगों का मन जीत लेते हें। 65 साल पहले के गांवों में दोनों बिना विवाह किए एक साथ काम करते हैं। विरसे को चोट लगती है तो वह भी महेन्द्र कौर के हाथों ही ठीक होता है।
’मेला‘ खंड में गांवों में डकैतियों व ब्रिटिष पुलिस के भ्रष्टाचार के किस्से भी बयान हुए हैं, कपूरा कई गांवों के बदमाषों के साथ मिलकर पूरे गांव में डाका डालता है, यहां तक कि अपनी बहिन का घर भी नहीं छोड़ता। वह पहचान भी लिया जाता है, लेकिन उसका बहनोई बदनामी से बचने के लिए थानेदार को रिष्वत देकर साले का नाम आने से बचाता है।
विरसे के दोस्त सिराज की बहिन रेषमा गांव से लड़के सुल्तान को चाहने लगती है तो सिराज उसे मारने पर उतारू हो जाता है लेकिन विरसा उसे रोकता है।
’झमेला‘ खंड में डकैती का माल लेकर विरसा सिराज के यहां जाता है। चारगांव का जरायम पेषा करीमू तीन औरतें लेकर वहां जाता है। इन तीन औरतों में से ज्यादा ही चुस्त भरतपुर की बेला करीमू को छोड़ विरसे के पास आ जाती है। विरसा उसे गांव ले आता है, लेकिन बेला उसके प्रति वफादार न होकर, किसी से भी संबंध बना लेती है।
इस बीच गांव के हेडमास्टर सूरज सिंह, मास्टर चानन मल्ल आदि के साथ सूरत सिंह जिन्नाह के दो राष्ट्र सिद्धान्त पर भी चर्चा करते हैं। 1945-46 के दिनों का वर्णन है, जब सांप्रदायिक तनाव बढ़ने लगता है, मुस्लिम लोगों भी गांव में आने लगते हैं और पाकिस्तान की चर्चा चलने लगती है। चारगांव के है, मुस्लिम लीगी भी गांव में आने लगते हैं और पाकिस्तान की चर्चा चलने लगती है। चारगांव के मुसलमान शांति चाहते हैं और गांव के हिन्दू सिखों से सुरक्षा का वायदा भी करते हैं। लोहड़ी के जष्न इक्ट्ठे मनाए जाते हैं।
इस बीच करीमू गांव लौटकर सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने लगता है। इस बीच पुलिस विरसो के साथी-राजहंस, श्ुर्ली और तीन लोगों को मार डालती है।
उपन्यास के तीसरे खंड ’होला‘ में विभाजन की नीतियों पर लंबी चर्चा होती है। करीमू के माहौल बिगाड़ने पर उसे गांव के लोग ही लगभग मार डालते हैं, लेकिन वह बच जाता है। इस बीच बेला विरसे को छोड़कर भाग जाती है और विरसा गोविंदी से माफी मांग कर उससे प्रेम करने लगता है। उसके व्यक्तित्व में तब्दीली आने लगती है। महेन्द्र कौर माता-पिता के पास लुघियाना जाती है। गांव वालों को मिलिट्री की सहायता से कैंप में पहुंचाया जाता है। इस बीच विभाजन के माहौल में अफवाहें फैलती हैं, लूटपाट और हत्याओं का दौर चलता है। लोग काफिलों में सरहदें पार कर रहे हैं। विरसा और काबुला आदि मुसलमान ट्रक ड्राइवरों के साथ अमृतसर पहुंच जाते हैं, इधर गाड़ी पर आ रही गोविंदी को करीमू उठा ले जाता है, पेषोरा व सूरत को चोटें लगती हैं। विरसा चारगांव लौट कर गोविंदी को छुड़ाकर लाता है। बेला इस बीच करीमू की बीबी बन गई है। मनमोहन सिंह गोविंदी व विरसे को सुरक्षित सरहद पार करवा देता है। विरसा फिर पटियाला जाकर अपने दोस्त सिराज परिवार को बचाता है और उसे रेषमा के मनचाहे सुल्तान सहित सुरक्षित सरहद पार पहुंचाता है। उपन्यास की समाप्ति पर सरहद पर विरसा और सिराज एक दूसरे से गले मिलते हैं।
भारत का भारत और पाकिस्तान – दो देषों में बंटवारा सांप्रदायिक तनाव और हत्याओं के बरक्स सिराज और विरसे का एक दूसरे से गले मिलना – कला के स्तर पर विभाजन की क्रूरता पर एक कड़ी टिप्पणी है।
बलवंत सिंह ने पंजाब के जनजीवन से संबंधित पांचों उपन्यासों में से ’काले कोस‘ में पहली बार अपने नायक का पूरे तौर पर मानवीय रूपांतरण किया है। विरसा की प्रवृतियां अपराधी किस्म की हैं, गोविंदी को वह अच्छा लगता है और उसका पिता भी उसके साथ बेटी के रिष्ते को राजी है, लेकिन उपन्यास के प्रारंभ में वह गोविंदी के पिता की भावनाओं को अपने असभ्य उत्तर से आहत करता है। विरसा डकैती आदि में, मारपीट में हिस्सा लेता है, लेकिन उसको लगी चोट भी महेन्द्र कौर जिस तत्परता और ध्यान से ठीक करती है, उससे उसमें कुछ मानवीयता जागती है। वह खुद को ’इजारबंद का कच्चा‘ कहता है और अनेक स्त्रियों से संबंध बनाता है, लेकिन जब बेला उसके सामने ही अन्य पुरूषों से संबंध बनाती है तो उसे भयानक चोट लगती है। अंततः वह अपराध के रास्ते से इंसानियत के रास्ते पर लौटता है और विभाजन के दौरान उसका श्रेष्ठतम रूप प्रकट होता है, जब वह प्राण खतरे में डालकर पहले गोविंदी को पाकिस्तान से बचा कर लाता है और फिर अपने दोस्त और उसके परिवार को हिन्दुस्तान/पटियाला से बचाकर सरहद पार (पाकिस्तान) पहुंचा कर आता है। उसमें इस हद तक मानवीयता जागती है कि सिराज जिस सुल्तान को अपनी बहिन से प्रेम करने के कारण मार देना चाहता था, रेषमा का संबंध उसी से करने को वह सिराज को मना लेता है और सुल्तान को भी हद पार करवा देता है।
’काले कोस‘ में बलवंत सिंह की उदार मानवीय विष्व दृष्टि अपने प्रखर रूप में व्यक्त हुई है। विभाजन की पूरी प्रक्रिया को बलवंत सिंह अपने उपन्यास में जन भावनाओं के चित्रण द्वारा गलत ठहराते हैं। भले ही सांप्रदायिक लोग गांवों-शहरों में तनाव पैदा करते हैं , लेकिन बलवंत सिंह द्वारा चित्रित गांवों में सांप्रदायिक विचारों का असर नहीं होता। उस विषैले माहौल में भी बलवंत सिंह अपने किरदारों द्वारा रौषन ख्यालों व धार्मिक सहिष्णुता से भी बढ़कर हिंदू-सिख, मुसलमानों के सांस्कृतिक रूप से गहरे रूप में साझे संबंधों की मषाल जलाए रखते हैं। विरसे का सिराज को सरहद पार करवाना और हद पर एक दूसरे से गले मिलना यही संदेष देता है कि हमें (जनता को) एक दूसरे से राजनेताओं ने या ब्रिटिष उपनिवेषवादियों ने ज़बरदस्ती अलग किया है, वरना हम लोगों में बंटने को था क्या?
कई मायनों में ’काले कोस‘ विभाजन की अमानवीयता पर ’झूठा सच‘ और ’तमस‘ से भी ज्यादा तीखी टिप्पणी है और इस उपन्यास में मार्मिकता भी अधिक है। ’काले कोस‘ में विभाजन और पात्रों की चर्चा प्रासंगिक और तर्कपूर्ण है। उसमें एक दूसरे पर दोषारोपण की बजाय, दोनों पक्षों के दृष्टिकोण वस्तुगत रूप में रखे गए हैं। उपन्यास के उदार और वामपंथी पात्रों – बेलीषाह, सिराज, सूरत व महेन्द्र कौर के विचारों के साथ लेखक की सहानुभूति है।
’काले कोस‘ गहरे स्तर पर मानवीय रचना है। वास्तव में जितना महत्व इस उपन्यास को मिलना चाहिए था, जाहिर था, उतना मिला नहीं है। यह रचना आज के भारत पाक में मित्रता की पेंग बढ़ाने के दौर में और भी अधिक प्रासंगिक है। यह उपन्यास उर्दू में छपा तो है ही, इसे पाकिस्तान में भी खूब पढ़ा जाना चाहिए ताकि विभाजन का व्यर्थताबोध और गहरा सके।
बलवंत सिंह काफी हद तक पूर्णकालिक लेखक थे और लेखन उनके लिए आजीविका का साधन भी था। इसलिए उन्होंने बहुत सा सामान्य स्तर का कथा लेखन भी किया है, लेकिन पंजाब के जन-जीवन से संबंधित उनका कथा लेखन (कहानी और उपन्यास-दोनों) बहुत मन से किया गया लेखन है। विषेषतः ’ग्रंथी‘ आदि कहानियों व ’काले कोस‘ आदि उपन्यासों में तो कलात्मक और मानवीय दोनों स्तरों पर वे श्रेष्ठ लेखन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
अच्छा होता यदि हिन्दी में बलवंत सिंह के कथा लेखन पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाए और वस्तुगत ढंग से हिन्दी कथा लेखन में उनके योगदान को चिन्हित कर ससम्मान स्वीकार किया जाए।
प्रो. चमन लाल,
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