यादों के झरोखे से: नामवर सिंह- चमन लाल

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नामवर सिंह – यह नाम कब मेरे जे़हन में पहली बार दर्ज हुआ ? याद करने की कोशिश करता हूँ तो साल 1966 या 1967 ही सामने आएंगे। 8 जून 1964 को, जिस दिन पंडित नेहरू के राख विसर्जन के मौके पूरे देश के कस्बों/शहरों में हड़ताल रही थी, मैं अपने कस्बे रामपुरा फूल की पब्लिक लायबे्ररी से पढ़ने के लिए ‘गोदान’ लाया था और पूरे दिन में पढ़ कर ख़तम किया था। 1965 से 1967 के दौरान अपने कस्बे के स्कूल से जूनियर बेसिक टीचर (जे.बी.टी.) का प्रशिक्षण प्राप्त करने के दौरान ही 1966-67 के दौरान ‘प्रभाकर’ (आॅनर्स इन हिंदी) की परीक्षा पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से पूरे पंजाब में प्रथम रहकर पास की थी। ‘प्रभाकर’ का स्तर लगभग एम.ए. (प्रथम वर्ष) के बराबर माना जाता था। आलोचनात्मक साहित्य से परिचय इसी काल में पहली बार हुआ। इस समय यह याद नहीं कि ‘प्रभाकर’ की तैयारी के दौरान नामवर सिंह की कोई किताब पढ़ने को मिली या नहीं, लेकिन 1970-71 के दौरान एम.ए. (प्रथम वर्ष) की परीक्षा की तैयारी प्राइवेट छात्र के रूप में करने के दौरान कम से कम ‘छायावाद’ तो अवश्य ही पढ़ी थी। क्योकि इस परीक्षा की तैयारी के लिए पुस्तक सूची तैयार करने के लिए मैं उन दिनों जालंधर के पंजाब विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केन्द्र में कार्यरत रमेश कुंतल मेघ के पास विशेष रूप से गया था और छायावादी कवियों को समझने के लिए उन्होंने नामवर सिंह की पुस्तक की सिफारिश की थी। बाद में 1971-72 में एम.ए. (द्वितीय वर्ष) पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में बाकायदा होस्टल में रह कर करने के दौरान, डाॅ. इन्द्रनाथ मदान और कुमार विकल की संगति में रहते हुए यह मुमकिन ही नहीं था कि मैं नामवर सिंह की किताबें न पढ़ता या उनके बारे में इन दोनों से काफी चर्चाएं न सुनता। लेकिन उस समय भी यह याद नहीं कि उस साल के छात्र जीवन के दौरान नामवर सिंह को चंडीगढ़ में देखा या नहीं।सातवें दशक में नक्सलवादी क्रांतिकारी उभार के दौरान मैं हिंदी और पंजाबी के प्रगतिशील साहित्यक/सांस्कृतिक आंदोलनों से जुड़ गया था और हिंदी की विशिष्ट रचनाओं का पंजाबी में अनुवाद भी करने लगा था। इस बीच मुक्तिबोध के साहित्य पर शोध के लिए रमेश कुंतल मेघ के निर्देशन में चंडीगढ़ में पंजीकरण भी करवाया, लेकिन गांव के स्कूल की हिंदी अध्यापक की नौकरी में रहते ज्यादा काम नहीं कर पाया। शोध न कर पाने की स्थिति में 1972-74 के दौरान मैंने प्राइवेट रूप में पंजाबी की भी एम.ए. कर डाली और तब जेएनयू की चर्चाएं भी पंजाब के बौद्धिक हल्कों में पहुंचने लगीं। पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में साथी रहे प्रीतम गिल और भगवान जोश जेएनयू पहुंच गए और मैं भी जेएनयू में दाखिले के लिए बेचैन होने लगा। 1975 में जेएनयू में पी-एच.डी. (हिंदी) के लिए पहली बार दाखिला खुला और मैंने भी फार्म भर कर भेज दिया। इंटरव्यू के लिए जब तार पहुंचा तो मैं इमरजेंसी लगने के दिन (26 जून) की सुबह ही हरभजन सोही के घर से उसके साथ गिरफ्तार होकर जेल पहुंच गया था। (हरभजन सोही की पाश पर कविता ‘दरवेश आंखों वाला दबंग शायर’ नामवर जी ने 1988 में ‘आलोचना’ के पाश विशेष खंड में छापी थी और इस भूमिगत नक्सलवादी सिद्धांतकार का हाल में 15 जून को भटिंडा में निधन हुआ है)। इन्टरव्यू तार के आधार पर ज़मानत की अर्ज़ी अदालत ने रद्द कर दी तो 1976 में मैंने फिर आवेदन किया। इस बार मैं जेल में तो नहीं था (27 जनवरी 1976 को रिहाई हो गई थी) और नामवर जी के पास कुमार विकल और रविन्द्र कुमार श्रीवास्तव (भाषा वैज्ञानिक – हरजीत सिंह गिल के संदर्भ से) की मेरे लिए सिफारिशें भी पहुंच चुकी थीं। इस बार टेस्ट के दौरान उदय प्रकाश ने मेरा पेपर देखा था और उसे अच्छा लगा था और हमारे बीच सद्भावपूर्ण संबंध बन गए थे। चयन भी हो गया, लेकिन इस साल विजयशंकर चैधरी और मेरा चयन खुफिया पुलिस की रिपोर्ट के कारण रद्द कर दिया गया था। लेकिन यह साल था, जिसमें नामवर सिंह से निश्चित रूप से पहली भेंट हुई थी। 1976 का रद्द चयन मार्च 1977 में बहाल कर दिया गया। मेरे सामने दो विकल्प थे – या सीधे पीएच.डी. में उसी समय दाखिला ले लेता या जुलाई 1977 में एम.फिल. में पुनः कोशिश करने का। विजय शंकर चैधरी ने तो दाखिला ले लिया, मैंने दूसरा विकल्प चुना और 1977 में जेएनयू में एम.फिल./पीएच.डी. में दाखिले के साथ ही नामवर सिंह से एक छात्र के रूप में जो संबंध बना, वह अपने उतार-चढ़ावों के साथ आज तक जारी है।पंजाब के पिछड़े ज़िला भटिंडा के छोटे से कस्बे रामपुरा फूल के निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले मेरे जैसे छात्र के लिए जेएनयू जैसे एक स्वप्नलोक था। हालांकि अपने कस्बे में ही वामपंथी आंदोलन से जुड़कर व दो बार एक-एक साल के लिए पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ के होस्टलों में रहकर मैं बहुत हद तक जेएनयू के उन्मुक्त वातावरण के लिए मानसिक रूप से काफी तैयार था, लेकिन फिर भी वामपंथियों के एक छोटे से दायरे की उन्मुक्तता से यह विशाल सामाजिक उन्मुक्तता बहुत आकर्षक थी। सबसे बड़ी बात यहां छात्र-छात्राओं व अध्यापक-विद्यार्थियों के बीच संबंधों में जनतांत्रिकता का होना था। यहां मैं दस साल स्कूल अध्यापक की नौकरी व टेªड यूनियन तथा सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रियता निभा कर आया था तथा दूसरे छात्रों से उम्र भी कुछ बड़ी थी (तीस वर्ष) इसलिए सेंटर या अन्य सेंटरों के छात्र-अध्यापक भी कई बार मेरे नाम के साथ ‘जी लगाकर ही संबोधन करते थे। मैंने भी न पहले कभी पंजाब में और न जेएनयू में ही कभी किसी अध्यापक के चरण छुए, यहां तक कि ‘सर’ की बजाय भी चंडीगढ़ और दिल्ली दोनेां जगह मैं अपने अध्यापकों को डाॅ. साहब कह कर ही संबोधित करता था। खुद भी मैंने आज तक न घर के बच्चों या किसी छात्र से ही पांव छुआए हैं। मुझे इस बात का न तो उस समय एहसास हुआ और न ही शुरुआती नौकरियां समय पर मिलते रहने के कारण, लेकिन बाद में अपने कैरियर के मध्य में ज़रूर यह पता चल गया कि ‘सर’ संबोधन न करने से कितने नुकसान हो सकते हैं। वाइस चांसलरों को भी ‘मुझे सर’ कहना गवारा नहीं हुआ, हाँ औपनिवेशिक ‘साहिब’ का संबोधन उच्च पदासीनों के लिए ज़रूर सीख लिया था।खैर ! 1977-78 का प्रथम वर्ष जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र में बहुत दोस्ताना माहौल का साल था। इसी साल केदारनाथ सिंह और मैनेजर पांडेय ने अध्यापक रूप में यहां ज्वाइन किया। 1974 में बाकायदा शुरू हुए केन्द्र के छात्रों में उदयप्रकाश, रामवक्ष, चै. रामवीर, घनश्याम मिश्र, मनमोहन, षुभा, पुरुषोत्तम अग्रवाल, सुरेश शर्मा, अली जावेद, कैसर शमीम, मौलाना अनीस, विजयशंकर चैधरी, हरप्रकाश गौड, सुमन केषरी आदि की मौजूदगी में केन्द्र के माहौल में अकादमिक गतिविधियां और मेल-मिलाप दोनों ही थे। गोरख पांडेय थे तो फिलाॅस्फी के छात्र, लेकिन उन्हें खूब सम्मान मिलता था, भारतीय भाषा केन्द्र में। केन्द्र उन दिनों ‘ओल्ड कैंपस’ में था और ‘क्लब बिल्डिंग’ की कैंटीन व लायबे्ररी वहां के जीवंत अड्डे थे। स्टुडेंट यूनियन के चुनाव के दौरान ‘क्लब बिल्डिंग’ की बहसें, एस.आई.एस. के सामने रात भर मतगणना और सुबह उठ कर जुलूस की शक्ल में नए कैंपस जाना। ‘एल-3’ में वक्ताओं के भाषण और उन पर गर्मागर्म बहसें, यह सब उन दिनों की सबसे सुहावनी यादों में हैं। केन्द्र में एस.एफ.आई. का वर्चस्व था। मनमोहन ने अपने स्वभाव, श्रम और बौद्धिकता से उसकी अच्छी साख और पैठ छात्रों के बीच बना ली थी, अली जावेद और पुरुषोत्तम ए.आईएस.एफ. में सक्रिय थे। मैं इन दोनों से कुछ आगे माना जाता था, लेकिन किसी संगठन में नहीं था, बाद में पी.एस.ओ. से कुछ समय संबंध रहा।मेरे छात्र जीवन में नामवर सिंह से हम लोगों ने ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’ पढ़ा, तो मैनेजर पांडेय से ‘साहित्य का समाजशास्त्र’ और केदारनाथ सिंह से ‘तुलनात्मक अध्ययन’। ‘शोध प्रविधि’ शायद सावित्री चंद्र शोभा से। नामवर सिंह की क्लास में सोशल साइंसेज से भी छात्र आते थे व भाषा संकाय के अन्य केन्द्रों से भी। इस दौर की कुछ खास बातें मुझे याद पड़ती हैं, उनमें विजयदेवनारायण साही द्वारा एल-3 में दिए भाषण के बाद मेरे द्वारा पूछे गए कुछ तीखे सवालों के बाद मैनेजर पांडेय को उनका दिया उलाहना भी है। मैं पांडेय जी के साथ शोध कर रहा था। लेकिन इस वजह से उन्होंने मेरा गे्रड खराब किया हो या कोई और नुकसान किया हो, ऐसा नहीं था। नामवर सिंह जब शाम को सैर करने निकलते थे तो उनके साथ घनश्याम मिश्र व दो तीन और छात्र हो लेते थे। चूंकि नामवर सिंह और घनश्याम मिश्र दोनों सफेद कुर्ता धोती पहनते थे तो जेएनयू के ज्यादातर पैंट पहनने वाले छात्र-छात्राओं के लिए यह एक दिलचस्प दृश्य भी हो जाता था, खासकर कई बार घनश्याम मिश्र अट्ठहास के रूप में हंसते थे। केन्द्र में उन दिनों एक दुःखद घटना यह हुई कि एस.एफ.आई. के छात्रों ने किसी बात को लेकर केन्द्र अध्यक्ष नामवर सिंह का उनके कमरे में घेराव कर लिया। बाकी अध्यापक – केदारनाथ सिंह, मैनेजर पांडेय आदि भी वहीं थे। जब तक सामान्य नारेबाजी चली, तब तक तो खास बात नहीं थी, लेकिन एक एस.एफ. आई. कार्यकर्ता उमांशंकर उपाध्याय ने नामवर सिंह को जब भद्दी गालियां देनी शुरू की तो माहौल बिगड़ गया। इसके बाद केन्द्र के छात्रों की हंगामी जी.बी.एम. हुई, जिसमें पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इस घटना की सख्त मज़म्मत का प्रस्ताव किया, जिसका मैंने समर्थन किया। हालांकि उपाध्याय के खिलाफ कुछ खास कार्रवाई नहीं की गई।एम.फिल. पूरा करने के बाद, जैसा कि अब मैं समझ सकता हूं, मैंने चाहा कि मैं पीएच.डी. नामवर सिंह के साथ करूं। दो-तीन बार उनसे बात की उन्होंने साफ मना तो नहीं किया, लेकिन हामी भी नहीं भरी, बाद में मैंने अपना शोध पांडेय जी के साथ ही पूरा किया और जेएनयू मंेै उनका पहला पीएच.डी. प्राप्त छात्र बना। लेकिन आज जब मेरे पास भी किसी दूसरे अध्यापक के साथ एम.फिल. किए छात्र आते है। तो मैं भी उन्हें स्वीकार नहीं करता। छात्रों के बीच असुरक्षा बोध व नौकरी पाने की ख्वाहिश से वे केन्द्र के ‘प्रोफेसर’ के साथ शोध छात्र रूप में जुड़ना चाहते हैं, क्योंकि विश्वविद्यालयों में विशेषज्ञ रूप में केवल ‘प्रोफेसर’ ही जाते हैं और वे न भी जाएं तो प्रभाव उन्हीं का अधिक होता है। इसलिए वे भी ऐसे ही केन्द्र के प्रोफेसर से जुड़ना चाहते हैं जैसे मैं अपने छात्र जीवन में चाहता था। अकादमिक पे्ररणाएं भी ज़रूर होती हैं, इससे इन्कार नहीं है।छात्र जीवन के कुछ बाद की भी एक घटना नामवर सिंह से संबंधित मुझे याद है। वीर भारत तलवार को मैं 1977 में जेएनयू आने से पहले फिलहाल संपादक व राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जानता था, मिल भी चुका था। इसलिए 1980 में जब तलवार जेएनयू में दाखिल हुए तो होस्टल अलाट होने तक मेरे पास 305, पेरियार में ही रुके रहे थे। (जेएनयू छोड़ने के बाद मैं भी पूर्वांचल 09 में उनके कमरे में रुकता रहा था)।तलवार जी रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, रणधीर सिंह, विपन चन्द्रा आदि से ‘फिलहाल संपादक रूप में अपनी घनिष्ठता बनाए हुए थे। लेकिन जेएनयू आने के बाद पहले तो रामविलास शर्मा से उनके संबंध खराब हुए, बाद में नामवर सिंह के साथ भी, जिनके साथ उन्होंने पीएच.डी. की। उन्हें नामवर सिंह के साथ ही पीएच.डी. करने के लिए पे्ररित करने में भी मेरी कुछ भूमिका थी। जब नामवर सिंह से भी उन्होंने बोलना बंद कर दिया और बेकारी के मारे दिल्ली में हालत भी खराब होने लगी तो मैंने उन्हें कुछ हद तक कठोरता से भी कहा था कि यदि आप ऐसे ही सबसे संबंध खराब करते रहेंगे (पांडेय जी से उनके संबंध पहले से ही खराब थे, शायद बी.एच.यू. में ही ये खराब हो चुके थे।) तो नौकरी की उम्मीद छोड़ दीजिए और बिहार जाकर राजनीतिक काम कीजिए। नामवर सिंह से तब उन्होंने संबंध सुधारे और नामवर सिंह ने तब पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में उनकी मदद की और बाद में जेएनयू में भी वे उनके कारण ही पहुंचे। हाल के वर्षों में तलवार जी के संबंध मेरे साथ भी जब खराब हुए और नामवर सिंह ने केन्द्र की सेंटर मीटिंगों में तलवार जी का अध्यक्ष रूप में अतार्किक रूप में समर्थन किया तो मैंने मीटिंगों में ही उनसे कहा था कि ‘आप हमारे अध्यापक हैं और तर्क करना हमने आपसे ही सीखा है, इसलिए आपकी बातों का विरोध इस तार्किकता के बल पर ही कर रहा हूँ’। नामवर सिंह ने उस समय तो यही कहा था कि ‘तर्क करें, कुतर्क नहीं’ लेकिन मैं समझता हूं कि उन्हें ‘तर्क’ और ‘कुतर्क’ का फर्क मालूम था, बाद में उन्होंने सेंटर मीटिंगों में आना लगभग बंद कर दिया। वैसे भी रिटायर होने के 17-18 वर्ष बाद ही वे दोबारा कुछ मीटिंगों में आए थे।नामवर सिंह जब हरियाणा साहित्य अकादमी के परामर्शदाता हुए तो उन्होंने इतनी अच्छी किताबें वहां से लिखवाईं, जिनमें मैनेजर पांडेय की ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ शायद सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुई। मुझसे भी उन्होंने उस समय ‘प्रतिनिधि हिन्दी उपन्यास’ (भाग दो) लिखवाई। 1988 में पाश के कत्ल के बाद मेरे द्वारा अनूदित पाश के काव्य संग्रह ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ की भूमिका उन्होंने लिखी। बाद में पाश पर 1989 में ही ‘आलोचना’ में विशेष खंड उन्होंने दिया, जिसमें मेरे द्वारा अनूदित कविताएं, पाश पर नक्सली नेता हरभजन सोही की अनूदित कविता व पाश पर मेरे संस्करण छापते हुए मुझे ‘हमारे प्रिय मित्र’ के रूप में याद किया। यह भी एक संयोग है कि साहित्य अकादमी का अनुवाद पुरस्कार मुझे पाश की कविता के अनुवाद ‘समय ओ भाई समय’ (राजकमल 1993) पर उसी दौर में मिला जब नामवर सिंह हिंदी के संयोजक थे। पाश का मेरे द्वारा हिंदी में अनूदित संग्रह ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ जब 25 मार्च 1989 को त्रिवेणी में रिलीज़ किया गया तो इसे रिलीज़ करने पंजाब के कम्युनिस्ट नेता सत्यपाल डांग को बुलाया गया था। मंच पर सत्यपाल डांग के साथ नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, पाश के भाई ओंकार सिंह, शीला संधू व मैं उपस्थित थे। यह एक यादगारी कार्यक्रम था, जिसमें दिल्ली के तमाम बड़े हिंदी लेखक शामिल हुए थे।जेएनयू आने वे पहले नामवर सिंह की पुस्तक ‘इतिहास और आलोचना’ में से एक लेख ‘कलात्मक सुंदरता का आधार’ का मैंने पंजाबी अनुवाद किया, जो दिल्ली की उस समय की चर्चित पत्रिका ‘सेध’ में मार्च 1977 में छपा था। बाद में संरचनावाद पर मैंनेजर पांडेय के दो लेखों का मैंने पंजाबी में अनुवाद किया था। नामवर सिंह के गुरदयाल सिंह पर लेखन से स्वयं गुरदयाल सिंह इतना अभिभूत हैं कि अपने ज्ञानपीठ पुरस्कार का श्रेय नामवर सिंह को ही देते हैं। यह भी संयोग ही है कि नामवर सिंह ने जिन पंजाबी लेखकों – गुरदयाल सिंह और पाश्या पर लिखा, दोनों ही पंजाबी के बड़े लेखकों में शुमार किए गए। इसी वजह से पंजाबी के एक अन्य वरिष्ठ लेखक संतोष सिंह धीर अपने उपन्यासों पर नामवर सिंह से भूमिका लिखवाने के लिए इतने अधीर रहे हैं कि कई बार मैंने उनसे कहा, लेकिन सी.पी.आई. से जुड़े वरिष्ठ लेखक होने पर भी नामवर सिंह ने उन पर नहीं लिखा, जिससे वे आज तक नाराज हैं। ऐसी ही नाराज़गी पंजाबी के वरिष्ठ प्रगतिशील आलोचक टी.आर. विनोद को भी है, जो मेरे छात्र जीवन के दौरान बड़े उत्साह से मेरे साथ नामवर ंिसह से मिलने 109, उत्तराखंड पहुंचे थे नामवर सिंह ने भीतर तक नहीं बुलवाया और खड़े खड़े दो मिनट बात करके टरका दिया। नामवर सिंह का यह अंदाज मेरे या जेएनयू से जुड़े किसी दूसरे व्यक्ति के लिए झटका नहीं है, लेकिन टी.आर. विनोद के लिए यह स्तब्धकारी था और शायद बाद में उन्होंने पंजाबी में इस पर लिखा भी।नामवर सिंह से जुड़ी एक और घटना याद आती है। 1995 में जब जेएनयू में हिंदी अनुवाद में एसोसिएट प्रोफेसर (रीडर) पर इसी पद पर, पहले से गुरु नानकदेव विश्वविद्यालय अमृतसर में होने के बावजूद चयन एक नं. पर न करके दो नंबर पर किया तो मैं काफी समय इस चयन से जुड़े कई लोगों से खफ़ा रहा। लेकिन 1998 में पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में प्रोफेसर पद पर नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी व बच्चन सिंह ने परेश और मेरा चयन कर दिया और लक्ष्मीनारायण शर्मा को तीसरे नं. पर रख दिया। निर्मला जैन ने पहले ही इन लोगों को आगाह कर दिया था कि लक्ष्मीनारायण को हल्के में न लें, वह बहुत ‘पंगे’ करेगा। मैं वहां रीडर पद पर भी उम्मीदवार था, लेकिन चूंकि प्रोफेसर पद का इंटरव्यू पहले हो गया था, रीडर पद पर मेरा इन्टरव्यू लिया नहीं गया। हुआ वही, जो निर्मला जैन ने आगाह किया था, लक्ष्मीनारायण ने इसे आर.एस.एस. बनाम माक्र्सवाद का विकृत मुद्दा बना कर पंजाब विश्वविद्यालय की सीनेट और सिंडीकेट में भारी वितंडा खड़ा कर इस चयन को रद्द करवा दिया। पंजाब विश्वविद्यालय की सीनेट में आर.एस.एस. से जुडे़ सदस्यों ने नामवर सिंह पर भद्दे भद्दे आरोप लगाए, जो अब तक कार्रवाई से निकाले नहीं गए। मैं इन टिप्पणियों को निकलवाने के लिए सीनेट के प्रगतिशील सदस्यों के माध्यम से लड़ता रहा। इस चयन को रद्द करने के खिलाफ मैं 1999 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में गया, वहां पर यह मुकदमा तब से लंबित अवस्था में है। मैं चंडीगढ़ रीडर पद पर भी जाकर खुश था, लेकिन मुझे प्रोफेसर बनाने के चक्कर में वहां मेरा रीडर होना भी गया और 1998 के चयन के सात वर्ष बाद 2005 में ही मैं जेएनयू में प्रोफेसर हो पाया। बाद में कुरुक्षेत्र में प्रोफेसर पद पर एक इन्टरव्यू के समय दिल्ली से गए चंडीगढ़ के उम्मीदवार के हमनाम एक आर.एस.एस. उम्मीदवार ने फिर भद्दी गालियां नामवर जी को देते हुए मेरी तरफ इशारा कर कहा कि ‘वह इनको करेगा’ हालांकि उनकी ‘भविष्यवाणी’ सच्ची सिद्ध नहीं हुई।नामवर सिंह से जुड़ी कुछ और यादें भी हैं। पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला में 1980 में लेक्चरर पर पर नियुक्ति के कुछ महीने बाद ही मैंने वहां के एम.ए. कोर्स में लगे गुरुदत्त के उपन्यास के खिलाफ मुहिम शुरू कर दी। ‘हंस’ के जुलाई 1986 के पहले ही अंक में इस संबंध में मेरा पत्र छपा। लेकिन इससे पहले आर.एस.एस. से जुड़े वर्चस्वकारी अध्यापकों से विश्वविद्यालय में मेरी झड़पें व वाईस चांसलर तक मेरी शिकायतें हो चुकी थीं। तीसरी मंजिल से नीचे फेंक देने की धमकियां भी दी जा चुकी थीं। इस स्थिति में जून 1986 की छुट्टियों में मैंने दिल्ली रहकर इस उपन्यास को कोर्स से हटाने का पे्रस के माध्यम से जो हस्ताक्षर अभियान चलाया, उसमें पी.एन. हक्सर, नामवर सिंह, भीष्म साहनी आदि तमाम महत्त्वपूर्ण लोगों के दस्तख़त हुए और पंजाबी विश्वविद्यालय के वी.सी. ने अपने कार्यकारी अधिकारों से इस उपन्यास को कोर्स से हटाया और इसे लगाने वाले प्रोफेसर को विभागाध्यक्ष पद से वंचित किया। जेएनयू के छात्र दिनों में किसी भी सामाजिक मुद्दे पर हम लोग जो हस्ताक्षर अभियान चलाते थे चाहे पिरथीपाल सिंह रंधावा की हत्या की घटना हो या अन्य गैर जनतांत्रिक घटनाएं, नामवर सिंह ने किसी पर दस्तख़त करने से मना नहीं किया।मेरे छात्र जीवन के दौरान नामवर ंिसंह के बेटे विजय बहादुर मेरे गृह ज़िले भटिंडा में नौकरी कर रहे थे व पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला से कोई कोर्स भी कर रहे थे। कई बार विजय से मिलने भी 109 उत्तराखंड जाना होता था। अब तो बरसों से विजय से भेंट नहीं हुई, ऐसे ही समीक्षा से भी 109 उत्तराखंड में एकाध बार जब भेंट हुई तो वह छोटी और भोली सी बालिका लगती थी। एकाध बार श्रीमती नामवर सिंह से भी घर के दरवाज़े पर हल्की सी बात हुई, वे इतनी शांत व स्नेहपूर्ण (सुंदर तो वे थी हीं) जान पड़ीं।नामवर सिंह से मेरा अधिक पत्राचार नहीं हुआ, लेकिन उनका एकाध स्नेहपूर्ण पत्र मेरे पास सुरक्षित है। दो-तीन बार साहित्यक मंचों पर एकसाथ हमने संबोधन किया है, लेकिन विचार वैभिन्नय से कोई कटुता नहीं हुई। नामवर सिंह से संबंधित एक दिलचस्प किस्सा हरियाणा साहित्य अकादमी के ही एक साहित्यिक कार्यक्रम का है, जिसकी अध्यक्षता हरियाणा के उस वक्त के शिक्षा मंत्री डाॅ. रामविलास शर्मा कर रहे थे। रामविलास शर्मा भारतीय जनता पार्टी से संबंधित थे और वाग्वैदिग्ध्य में नामवर सिंह के बराबर ही छूटते थे। नामवर सिंह ने उनकी प्रशंसा के वह पुल बांधे कि उन्हें हिंदी के वरिष्ठ आलोचक रामविलास शर्मा से भी बड़ा बना कर पेश कर दिया। ऐसा ही खेल उन्होंने एक आई.पी.एस. अधिकारी कवि की कविताई को मुक्तिबोध से आगे की कविताई कह कर किया था। लेकिन ऐसे भी अनेक मौके आए हैं जब उन्होंने मंच पर ही विद्यमान दूसरे वक्ता की धज्जियां भी उड़ाई हैं, प्रायः जिनकी धज्जियां उड़ी हैं वह प्रशासनिक या कार्यकारी स्तर पर बहुत बड़ा अधिकारी जैसे वाईस चांसलर नहीं होता रहा।नामवर सिंह ने बहुत यादगारी भाषण दिए हैं। एक मुझे याद है, जो उन्होंने कमानी सभागार में उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की मौजूदगी में हरिवंशराय बच्चन गं्रथावली के रिलीज़ कार्यक्रम पर दिया था, तब तेजी बच्चन व उनके बेटे भी मौजूद रहे होंगे। इंदिरा गांधी मंत्रमुग्ध होकर एक घंटे से ज्यादा उन्हें सुनती रही थीं, नामवर सिंह की वक्तृता शक्ति हाल के वर्षों में क्षीण हुई है, क्योंकि उन्हें बहुत जगह बुलाया जाता है और वे लगभग एकाध किताब देख कर चले जाते हैं। पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला में 2003 या 2004 में गुरदयाल सिंह पर उनका भाषण बहुत प्रभावी नहीं रहा। देशभक्त यादगार हाल, जालंधर ने उन्हें बुलाने की बरसों कोशिशें की, वे नहीं गए, लेकिन हाल में केन्द्रीय पंजाबी लेखक सभा के निमंत्रण पर कई जगह पंजाब में हो आए।नामवर सिंह के व्यक्तित्व में भी हर व्यक्ति की तरह अन्तर्विरोध है। बेटी की शादी प्रसन्नता से गैर जातीय वर से करने में उनका बड़प्पन है और सामंती प्रवृत्ति से मुक्ति की तलाश भी, लेकिन कई और चीजों में उनकी सामंती प्रकृति ऐसे ही झलक आती है, जैसे हिंदी के तमाम प्रगतिशील, यहां तक कि क्रांतिकारी कहलाने वाले विद्वानों/लेखकों में झलक आती है। लेकिन कुल मिलाकर उनके व्यक्तित्व का सबल पक्ष है जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र में हिंदी अकादमिकता में आधुनिक तर्क संगत प्रगतिशील विचारों को सशक्त रूप से प्रस्थापित करने का, जिन पर जेएनयू का भारतीय भाषा केन्द्र तो चल ही रहा है, अब अन्य अनेक विश्वविद्यालयों में भी हिंदी अकादमिकता को पिछड़े जड़ सामंती पाठ्यक्रमों व संस्कारों से कुछ मुक्ति हासिल होना शुरू हो गई है। हिंदी अकादमिकता में विचार पक्ष में प्रगतिशीलता स्थापित करने के लिए नामवर सिंह को हमेशा याद रखा जायगा, जो उनके व्यक्तित्व के अन्तर्विरोधों के विवादों से अलग एक निर्विवाद और अकाट्य तथ्य है। जीवन के अस्सी वर्ष पूरे करने पर उन्हें अपने और भारतीय भाषा केन्द्र की ओर से शतायु होने की हार्दिक शुभकामनाएँ।चमन लालप्रोफेसर व अध्यक्षजवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालयनई दिल्ली-110067