Dalit Discourse in Prem Chand Writings

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प्रेमचन्द साहित्य में दलित विमर्ष
चमन लाल
प्रेमचंद के दलित विमर्ष को लेकर हिन्दी लेखकों में काफी विवाद है। पे्रमचंद के जीवनकाल के दौरान भी उनके साहित्य को लेकर विवाद उठते रहते थे। उनके जीवनकाल में ही उन्हेंघृणा का प्रचारक‘, ’ब्राह्मण विरोधी‘, ’प्रचारवादी‘, विदेषी साहित्य का नकलचीइत्यादि कहा गया। इस सारे दुष्प्रचार का जवाब पे्रमचंद ने तो अधिक नहीं दिया, लेकिन उनके प्रषंसक बालकृष्ण शर्मा नवीन ने कहा था कि प्रेमचंद के निंदक मर जाएंगे, लेकिन पे्रमचंद जीवित रहेंगे। आज कौन पं. ज्योतिप्रसाद निर्मल, या ठाकुर श्रीनाथ सिंह या ऐसे कुछ और लोगों का नाम जानता है, जिन्होंने पे्रमचंद के जीवनकाल में उनपर बहुत नीचे स्तर पर आक्रमण किए थे। लेकिन पे्रमचंद पर आक्रमणों का सिलसिला पूरी तरह खत्म कभी नहीं हुआ। पे्रमचंद के देहांत के 65-70 साल बाद उनके बहुचर्चित उपन्यासरंगभूमिको सार्वजनिक रूप् से जलाया गया और उन्हेंदलित विरोधीकहा गया। हाल में उन्हेंसामंत का मुंषी औरजारकर्म का दोषीकरार दिया गया। कुछ वर्ष पूर्व उन्हंेसूदखोरआदि उपाधियों से विभूषित किया गया था।
इन सब आरोपों के साथ एक प्रेमचंद को या तो साहित्य से खारिज करने की या उनका कद कम करने की कोषिष की जाती है तो दूसरी और उन्हें बेहद गरीब, बेचारा मास्टर, लेकिन जनता का महान लेखक सितारा आदि रूप में संकल्पित किया जाता है। 1980 में यदि उनकी जन्मषती पर ढेरो कार्यक्रम हुए तो 25 बरस बाद अब उनकी सवा सौंवी जयंती पर देषभर में कार्यक्रम हो रहे हैं।
प्रेमचंद के प्रति दोनो ओर से यह अतिवादी दृष्टिकोण है। स्वयं पे्रमचंद को अपनी चाटुकारिता प्रसंद थी। कई जगह पर उन्होंने लिखा है कि उन्हेंउपन्यास सम्राटआदि उपाधियों की जरा भी इच्छा नहीं है, इस तरह की उपाधियां देने का उन्होंनें हमेषा ज़ोरदार विरोध किया और जीवन और साहित्य में वस्तुगत और संतुलित नज़रिया अपनाने पर ज़ोर दिया। पे्रमचंद ने अपने जीवन में संतुलित नज़रिया अपनाने का भरसक प्रयत्न किया और उनका दलित विमर्ष इसी संतुलित और वस्तुगत दृष्टिकोण का परिचायक है।
किसी भी लेखक में किसी तरह के विमर्ष को देखने समझने के लिए दोतीन आधार हैसबसे बड़ा और प्रमुख आधार है उसका लेखन सृजनात्मक चिंतनपरक दोनों, लेकिन मुख्य तौर पर सृजनात्मक। दूसरा आधार है उसका अपना जीवन व्यवहार। जीवन व्यवहार के स्तर पर भारत के ही नहीं; दुनिया के लेखकों के जीवन में भी अन्तर्विरोध मिलेंगे। लेखकों में सोचने लिखने और स्वयं अपने जीवन में उस सोच को अपनाने के स्तर पर अनेक अन्तर्विरोध उभर आते हैं। लेखक के अपने जीवन और उसके लेखन के जीवन में ज़मीन आसमान का फर्क है। एक लेखक का जीवन लगभग सौ वर्ष में सिमट जाता है, लेकिन उसके लेखन का जीवन, दषकों, सदियों कई बार सहस्राब्दियों तक भी चल सकता है और प्रेमचंद के लेखन का जीवन उनके व्यक्ति जीवन के प्रति तमाम तरह की प्रतिक्रियाओं के बावजूद, काफी दीर्धकालीन रहेगा। लेखक के व्यक्तिगत जीवन संबंधी प्रमाणिकता की तलाष उनके जीवनकाल में ही अधिक सार्थक होती है। लेखक के देहांत के बाद उसके जीवन की घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं एक हद तक निरर्थक प्रयास होते हैं या ज्यादा से ज्यादा उनका महत्व एकेडमिक स्तर तक सीमित होता है। अब यदि प्रेमचंद पर जारकर्म के आरोप लगाए भी जाएं तो दुनिया की कोई भी अदालत मृत व्यक्ति पर मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं देती और जब तक किसी व्यक्ति पर लगे अरोपों की किसी न्यायिक अदालत द्वार पुष्टि कर दी जाए, तब तक उन आरोपों का अपराधी उन्हें नहीं घोषित किया जा सकता हां, लेखक का लेखन हमेषा पाठकों/ आलोचकों की कचहरी में पड़ताल के लिए उपलब्ध रहता है और वह एक ऐसी प्रमाणिक सामग्री है, जिससे जीवित या मृत लेखक किसी भी तरह मुनकर नहीं हो सकता, केवल उस सामग्री की व्याख्या से जीवित अवस्था में वह अपनी सहमति/असहमति व्यक्त कर सकता है। तो वस्तुगत स्तर पर प्रेमचंद के किसी भी विमर्ष को उनके जीवन से नहीं उनके लेखन से व्याख्यायित किया जाना ज़रूरी भी है और सही तथा वस्तुगत भी। उनके जीवन में बारबार झांकना कई बार अपनी ही दृष्टि की सीमाओं को जगजाहिर करना सिद्ध हो जाता है। अतः पे्रमचंद का जीवन जैसा भी था और प्रायः वह अपने लेखन के काफी हद तक अनुरूप ही था, उनके लेखन को ही उनके दलित विमर्ष को समझने का आधार बनाया जाएगा और जैसे उनके अपने जीवन में अन्तर्विरोध थे, कुछ कुछ वैसे ही अन्तर्विरोध उनके लेखन में भी नज़र आते हैं, जिनपर इस आलेख में ध्यान आकर्षित किया जाएगा।
प्रेमचंद ने करीब साढ़े तीन दषक के अपने लेखन काल में विपुल मात्रा में साहित्य रचा है, जिसमें सृजनात्मक और चितनपरक दोनों तरह का साहित्य शामिल है। उनके लेखन में करीब पन्द्रह उपन्यास, ढाई सौ के करीब कहानियां, तीन नाटक, कुछ बच्चों के लिए लेखन के अतिरिक्त अनुवादअहंकार (अनातोले फ्रांस), गाल्सवर्दी के तीन नाटक, फिसानाएआज़ाद का लिप्यंतरण (आजाद कथा) के साथसाथविविध प्रसंगके तीन खंडों में आठ सौ के करीब लेख, टिप्पणियां समीक्षाएं तथा चिट्ठी पत्रीको दो भागों में पांच सौ साठ से उपर पत्र शामिल हैं। दुलारे लाल भागर्व कुछ अन्य व्यक्तियों से भी उनके पत्र मिल जाते तो यह संख्या हज़ार का आंकड़ा पार कर जाती। प्रेमचंद के जीवन लेखन पर ढेरों किताबें, हिन्दी और उर्दू में छप चुकी है छप रही है लेकिन उनका जीवनवृत जानने के लिए उनके अपनेजीवनसारया मेरी पहली रचना के इलावा उनकी पत्नी षिवरानी देवी रचितप्रेमचंद घर में‘, पुत्र अमृत राय रचितकलम का सिपाही मदन गोपाल रचितकलम का मजदूरही ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अमृतराय और मदन गोपाल ने लगभग साथ ही साथ प्रेमचंद की जीवनी लिखी और दोनों ही जीवतियों में विवरण का अदभुत साम्य मिलता है। लेकिन मदन गोपाल की जीवनी में श्रद्धा कम, तथ्यों घटनाओं का विवरण अधिक वस्तुगत है।
प्रेमचंद के इस विपुल साहित्य में से उनके सृजनात्मक साहित्य में अभिव्यक्त दलित विमर्ष से ही हिन्दी में अधिकांष विवाद पैदा हुए हैं। जैसे उनकीकफनकहानी परदलित विरोधीहोने का आरोप लगने से कही पहले हंसराज रहबर ने इस पर प्रगतिवाद विरोधी कहानी होने का आरोप लगा दिया था। दलित साहित्य पर पिछले एक दषक से शुरू हुई चर्चा मेंकफनकोदलित विरोधीकहानी कहा गया।
रंगभूमिउपन्यास की उसके छपने से लेकर भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा 2004 में सार्वजनिक रूप से उसकी प्रतियां जलाए जाने तक प्रायः प्रषंसा ही हुइ्र्र है। प्रेमचंद के जीवन काल में तोरंगभूमिको ही प्रेमचंद का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता रहा, ’गोदानसे भी बढ़ कर। पे्रमचंद के देहांत के बादगोदानको उनकी ही नहीं, हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ (षायद उर्दू की भी) औपन्यासिक रचना माना गया। साथ हीकर्मभूमि‘, ’प्रेमाश्रम, रंगभूमि सेवासदनभी अन्य उपन्यासों की अपेक्षा अधिक चर्चा में रहे।
रंगभूमिकी प्रषंसा में उसके साहित्यक गुणों के साथ साथ पहली बार एक दलित को उपन्यास का नायक बनाने को भी सराहनीय समझा गया, लेकिन उपन्यास छपने के करीब अस्सी वर्ष बाद दलित नायकत्व स्थापित करने वाले उपन्यास को इस आधार परदलित विरोधीकहा गया कि उसमें सूरदास का उल्लेख, जातिवाचक नाम के साथ किया गया है। और इसे हाल में बने उस कानून का उल्लंघन बताया गया, जिसके अनुसार किसी व्यक्ति को अपमानित करने के लिए उसकी जाति का उल्लेख नहीं किया जा सकता। इस कानून का सन्दर्भ उच्च जाति से संबंधित उन वर्चस्ववादी वर्गों जैसे जमींदार, कारखानेदार, बड़े अफसर आदि का है, जो अपने यहां काम करने वाले मजदूरों या मातहतों को उनकी जाति का नाम लेकर अपमानित करते हैं, जिनका बड़ा मार्मिक वर्णन ओमप्रकाष वाल्मीकि की आत्मकथाजूठनमें मिलता है। लेकिनरंगभूमिके किसी भी पाठक या आलोचक को उसमें प्रेमचंद द्वारा अपने किसी पात्र को इस ऐसे नज़रिए से पेष करने की गवाही नहीं मिल सकती।रंगभूमिके नायक सूरदास की जाति चमार होने का स्पष्ट उल्लेख करके भी पे्रमचंद ने उसे इतना सम्मानीय पात्र बनाया है कि तथाकथित ऊंची जातियों के लोग उसकी कुर्बानी के सामने बौने नज़र आते है और उसकी कीर्ति से स्पृहा करते हैं।
इसी प्रकार पे्रमचंद के सार्वश्रेष्ठ उपन्यासगोदानके बहुचर्चित सिलियामातादीन प्रसंग में भी जिस आक्रामक ढंग से मातादीन के मुंह में हड्डी डालकर उसे चमार बनाया जाता है और कैसे पं. दाातादीन को चमारिन स्त्री सिलिया को उसके पुत्र द्वारा भोग्या समझे जाने पर दंडित किया जाता है, इससे भी पे्रमचंद का अक्स दलित विरोधी का होकर काफी सषक्त दलित समर्थक का ही उभरता है। उपन्यास की अन्य प्रमुख पात्र कुर्मी स्त्री धनिया का किरदार भी पे्रमचंद ने ऐसी प्रखर और जागरूक स्त्री के रूप में चित्रित किया है कि उपन्यास के सभी पुरूष पात्र उसके सामने छोटे लगने लगते हैं।
कर्मभूमिउपन्यास में तो पे्रमचंद ने दलितों के लिए अत्यंत संवेदनषील मुद्दे मंदिर प्रवेष की ही समस्या नहीं उठाई, बल्कि दलित कर्म के संगठित होकर संघर्ष करने का भी विस्तार से चित्रण किया है।कर्मभूमिमें दलित समस्याओं संघर्षों का चित्रण व्यापक रूप में किया गया है।
प्रेमाश्रममें अछूतों से बेगार लिए जाने किसानों द्वारा भी उनसे अच्छा व्यवहार किए जाने का चित्रण हुआ है।कायाकल्पमें भी दलितों द्वारा बेगार करवाए जाने की प्रथा के प्रतिरोध के स्वर मुखरित हुए हैं।कायाकल्पमें पे्रमचंद पहली बार चमारों के लिए मजदूर शब्द का भी इस्तेमाल करते हैं।
गबनउपन्यास में प्रेमचंद ने देवीदीन खटीक के पात्र रूप में राष्ट्रीय आंदोलन में दलितों के योगदान को रेखांकित किया है।गबनके दलित पात्र अपने को निम्न जाति समझ कर अपने जाति गौरव का भी परिचय देते हैं।
इस आलेख में प्रेमचंद के चिंतनपरक लेखन में दलित विमर्ष पर अधिक ध्यान केन्दित किया गया है, लेकिन उनके कथासाहित्य पर संक्षेप में इसलिए विचार किया गया है कि प्रेमचंद के दलित विमर्ष संबंधी अभी तक उनके सुजनात्मक साहित्य को केन्द्र में रख कर ही चर्चा अधिक हुई है। उपन्यासों के अतिरिक्त दलित जीवन को मार्मिक रूप से चित्रित करने वाली पे्रमचंद की करीब पचास कहानियों में से अधिक चर्चित कहानियां हैं – ’सद्गति’, ’ठाकुर का कुआं‘, मंदिर‘, ’मंत्र‘, ’घासवाली‘, ’सवा सेर गेहुुं‘, ‘षूद्रा’, ’कफन‘ ’देवी‘, आदि।कफनको यद्यपि दलित विरोधी या प्रगतिवाद विरोधी कहा गया है, लेकिन कहानी के वस्तुगत ढंग से अध्ययन से ऐसी कोई लेखकीय भावना नजर नहीं आती।कफनकहानी में बल्कि एक रूपक के ज़रिए वर्चस्ववादी या शोषक वर्गों द्वारा गरीब दलित वर्गों के क्रूर शोषण का वर्णन कथित निठल्ले पात्रों द्वारा करवाया गया है। ऐसे पात्र गोर्की लूषुन की कहानियों में भी मिलते हैं और वहां भी गोर्की लूषुन की लेखकीय संवेदना अपने ऐसे ही चोर या निठल्ले पात्रों से ही जुड़ी होती है।
सृजानात्मक साहित्य में दलित पात्रों के चित्रण के साथ साथ पे्रमचंद नेज़माना‘, मर्यादा, ’माधुरी‘, ’हंसऔरजागरणआदि पत्रपत्रिकाओं में समयसमय पर संपादकीयों या अन्य लेख टिप्पणियों के रूप में भारतीय समाज में व्याप्त दलित समस्या पर गंभीरता से चिंतन किया है। 1933 मेंहंसके एक अंक के मुखपृष्ठ पर पे्रमचंद ने डाॅ. अंबेडकर का चित्र भी छापा, जो उन दिनों काफी बड़ी बात थी। विविध प्रसंग के तीन खंडों में से दूसरे खंड मेंछूत अछूतशीर्षक से प्रेमचंद के 27 लेख या टिप्पणियां संकलित है। इसी खंड मेंराष्ट्रीय रंगमंच स्वाधीनता संग्रामशीर्षक से संकलित लेखों मेंअछूतपन मिटता जा रहा है, मै भी प्रेमचंद का दलित विमर्ष अभिव्यक्त हुआ है। खंड एक मेंपुराना जमाना नया जमाना तथा खंड तीन में – ’जीवन और साहित्य में घृणा का स्थान‘, जातिभेद मिटाने की एक योजना‘, ’हिन्दू समाज के बीभत्स दृष्य‘ (1-3) में भी पे्रमचंद का दलित विषयक चिंतन उभर कर सामने आया है।
पे्रमचंद के चिंतनपरक इन तीस से अधिक लेखों/टिपपणियों द्वारा पे्रमचंद का दलित चिंतन भी स्पष्ट देखा जा सकेगा, साथ ही इस बात को भी देखा जा सकेगा कि पे्रमचंद के कथा साहित्य में दलित जीवन या पात्रों का जैसा चित्रण हुआ है, वह उनके इन लेखों के चिंतन का ही प्रतिरूप है या उससे कुछ अलग है।
फरवरी 1919 केज़माना‘ (उर्दू) में प्रकाषितपुराना ज़मानाः नया ज़मानालेख में पे्रमचंद ने दलित समस्या की ओर प्रत्यक्ष ध्यान तो नहीं दिलाया है, लेकिन रूस की अक्टूबर 1917 की क्रांति की प्रषंसा करके किसान मजदूरों की दषा की ओर ध्यान दिलाकर अपने चिंतन के जनतांत्रिक तत्व को अवष्य रेखांकित कर दियाः
क्या यह शर्म की बात नहीं कि जिस देष में नव्वे फीसदी आबादी किसानों की हो, उस देष में कोई किसान सभा, कोई किसानों की भलाई का आंदोलन, कोई खेती का विद्यालय, किसानों की भलाई का कोई व्यवस्थित प्रयत्न हो। आने वाला ज़माना अब किसानों और मज़दूरों का है। दुनिया की रफ्तार इसका साफ सबूत दे रही है। हिन्दुस्तान इस हवा से बेअसर नहीं रह सकता।‘ (विविध प्रसंगभाग एक, पृ268, 1962 संस्करण)
विविध प्रसंगभाग तीन में संकलित पे्रमचंद के बहुचर्चित निबंधजीवन और साहित्य में घृणा का स्थानमें 1933 में लिखा कि उन पर उनकी रचनाओं में ब्राहमणों के प्रति घृणा के प्रचार का आरोप है। इस आरोप को नकारते हुए पे्रमचंद ने स्पष्ट किया किनवीन साहित्य समाज का खून चूसने वालों, रंगे सियारों, हथकंडेबाजों और जनता के अज्ञान से अपना स्वार्थ सिद्ध करने वालों के विरूद्ध उतने ही ज़ोर से आवाज उठा रहा है और दीनों, दलितों, अन्याय के हाथ सताये हुओ के प्रति उतने ही जोर से सहानुभूति उत्पन्न करने का प्रयत्न कर रहा है।
पे्रमचंद की दलित वर्ग के प्रति चिंता वास्तव मंें जनतांत्रिक विचारों से ओतप्रोत है। फरवरी 1934 में लिखी टिप्पणीजातिभेद मिटाने की एक योजना में भी पे्रमचंद बड़े व्यंग्य से पूछते हैंः
क्या, हम पहले कायस्थ या ब्राह्मण या वैष्य हैं, पीछे आदमी, किसी से मिलते ही एक पहला सवाल यही करते हैं कि आप कौन साहब है। ग्रामीणों में भी यही ाप्रष्न पूछा जाता हैकौन ठाकुर? और हम कितने गर्व से अपने को शर्मा, वर्मा, तिवारी, चतुर्वेदी लिखते हैं कि क्या पूछना? यह इसके सिवा क्या है कि भेदभाव हमारे रक्त में सन मया है और हममें जो पक्के राष्ट्रवादी है, वे भी अपनी सांप्रदायिकता का बिगुल बजाकर फूले नहीं समाते, वरना उसकी जरूरत ही क्या है कि हम अपने को चतुर्वेदी या त्रिवेदी कहें। खासकर उस दषा में कि हमने वेद की सूरत भी नहीं देखी और इसमें भी संदेह है कि हमारे पूर्वजों ने भी कभी इसके दर्षन किए थे।
विविध प्रसंग के इसी खंड में पे्रमचंद ने तीन भागों में लेख श्रृखंला लिखीहिन्दू समाज के वीभत्स दृष्य। मार्चअप्रैल 1934 में लिखी इस श्रृंखला के पहले भाग में हिन्दू समाज में लाष की कैसे दुर्गति की जाती है, इस पर विस्तार से चर्चा की है, दूसरे भाग में अंधविष्वासों की, जिसके चलते तीर्थस्थानठगों के अड्डे और पांखडियों के अखाड़ेबन गए हैं और तीसरे भाग में मंदिरों की भीतरी दुर्दषा के चित्र खींचे गए हैंजितनी तीखी भाषा में प्रेमचंद ने इस कटु यथार्थ को व्यक्त किया है वैसा किसी दलित पृष्ठभूमि के लेखक ने भी नहीं किया होगाः
इन मंदिरों की आड़ में आज बड़ेबड़े लल्जाजनक कृत्य हो रहे हैं। पुजारियों का, महत्तों का और धर्मगुरूओं का जीवन भयानक विलासिता से भरा हुआ है। वे मंदिरों की आड़ में जघन्य से जघन्य कर्म करते नहीं शर्माते। ईष्वर को गाना सुनाकर खुष रखने के लिए उन्हें वेष्याएं चाहिएं। इस बहाने वे अपने राक्षसी कामना को पूरी करते और अपने जीवन को विलासवासना और पतन के गहरे गढे में डाल देते हैं। तिस पर भी हिन्दू समाज के लिए वे पूज्य हैं, माननीय हैं और देवता तुल्य हैं, क्योंकि वे पुजारी हैं, महन्त है और धर्मगुरू है।
विविध प्रसंगखंड दो में दलित प्रष्न पर अधिक विचार मिलते हैं और ये विचार गांधी और गांधीवाद से प्रभावित हैं। मई 1932 की छोटी सी टिप्पणीअछूतपन मिटता जा रहा हैमें पे्रमचंद ने कहा – ’जाति के बंधन इन कल कारखानों के युग में बहुत दिन तक नहीं रह सकते। महात्मा गांधी अछूतों की लड़ाई लड़ रहे हैं और इस काम में उन्हें कितने ही सज्जनों का सहयोग मिल रहा है। आधी कठिनाई इसलिए बढ़ गई है कि अछूत स्वयं अपने को नीच समझता है और ऊंची जातियों से दूर रहना ही अपना धर्म समझता है। (पृ.93)
इस टिप्पणी की पहली पंक्ति सैद्धान्तिक रूप में सही है, लेकिन कल कारखाने लगने के सौ से ज्यादा साल बाद तक अभी व्यवहारिक रूप में सही सिद्ध नहीं हो पाई है। अंत में अछूतो द्वारा स्वयं को नीचा समझा जाने की वृति तो ब्राह्मण वर्ग ने मनुस्मृतिआदि गं्रथों द्वारा उनके दिमाग में कूटकूट कर भरी है, उस विषैली खुद की दुष्मन वृति से अब वे मुक्त हो रहे हैं और इससे मुक्त होने में भूमिका गांधी या गांधीवाद की होकर डां. अंबेडकर उनके चिंतन की है, जिससे पे्रमचंद अभी कुछ दूर ही थे।
छूतअछूतशीर्षक से संकलित 27 लेख भी 1932-34 के बीच ही लिखे गए हैं, वास्तब में इन लेखों से पे्रमचंद का दलित विमर्ष अधिक साफ तरीके से उभरा है।
छूतअछूतशीर्षक से पहला लेखमहान तपहै, जिसमें महात्मा गांधी द्वारा दिसंबर, 1932 में यरवदा जेल में दलितों के लिए पृथक निर्वाचन के विरोध में भूख हड़ताल शुरू किए जाने का संदर्भ है। 19 दिसंबर 1932 को छपे इस लेख में महात्मा गांधी के प्रति पे्रमचंद की श्रद्धा छलक छलक पड़ती है – ‘ धन्य हो महात्मा! राष्ट्र की सेवा में तुम पहले ही अपना सर्वस्व अर्पण कर चुके थे। एक प्राण रह गया था। उसे भी राष्ट्र को ही भेंट करने जा रहे हो।‘ (’विविध प्रसंग, भाग दो, पृ.437, 1962 संस्करण)
हम स्वीकार करते तै कि शूद्रों के साथ हमने अन्याय किया है। हमने उन्हें जी भर कर रौंदा, कुचला, दला। इस अन्याय ने जिस हृदय को सबसे ज्यादा दुखी किया है, वह उसी तपस्वी का हृदय है जिसने अपना जीवन दलित भाईयों की सेवा में ही व्यतीत किया है ( वही पृ. 438) प्रेमचंद इस लेख में पूरे तौर पर गांधी के विचारों का समर्थन करते हैं और दलित वर्ग या समुदाय को हिन्दू समाज का ही अंग मानते हैं– ’ उनके देवता वही है, जो सब हिन्दुओं के हैं। आदर्ष वही हैं दृष्टिकोण वही हैं। हिन्दुत्व उनके अणु अणु में भरा हुआ है। (पृ.439, वही)
26 सितंबर 1932 को प्रकाषित अपने लेखहमारा कर्तव्यमें पे्रमचंद सम्मिलित निर्वाचन संबधी गांधीअंबेडकर समझौते का स्वागत करते हैं गांधी जी के सात दिन के उपवास से हासिल इस समझौते को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बताते हुए ब्रिटिष राजनीतिज्ञों द्वारामहान कौटिल्य के सीमेंट से तैयारउस दीवार को ध्वस्त करना बताते हैं जोहिन्दू अछतों को अलग करने के लिए बनाई थी। इस लेख में वे अपने पाठकों को गांधी का यह वचन भी याद दिलाते है
अस्पृष्यता या छुआछूत अगर हिन्दू धर्म में हो तो मुझे कहना पड़ेगा कि उसमें शैतानियत भरी हुई है, धर्म नहीं, पर मेरा दृढ़ विष्वास है कि हिन्दू धर्म में यह सब कुछ नहीं है।‘(पृ.442)
इन दोनों लेखों से स्पष्ट है कि दलित संबंधी चिंतन में प्रेमचंद डा. अंबेडकर से अधिक महात्मा गांधी से प्रभावित थे, 14 नवम्बर 1932 कोहरिजनों के मंदिर प्रवेष का प्रष्नविषय पर प्रेमचंद चिंता व्यक्त करते हैं कि उस समय के इस सबसे महत्वपूर्ण प्रष्न का हल यदि जल्द किया गया तोमहात्मा जी फिर अनषन षुरू कर दें।’ 21 नवंबर 1932 को इसी विषय पर प्रकाषित अपने लेख में पे्रमचंद ने बनारस के तथाकथितवर्णाश्रम स्वराज्य संघके अछूतों के मंदिर प्रवेष के विरोध के आंदोलन की जमकर खबर ली है, जिसकेफीटन आरोही मार्तण्डों में एक पुरी के श्री 108 शंकराचार्य भी थे।इस लेख में हिन्दू धर्म नेताओं में व्याप्त पाखंड की पे्रमचंद ने धज्जियां उड़ाई है – ’अछूत के पैसे तो आप बेधड़क ले लेते हैं अछूत कोई मंदिर बनावे, आप दलबल के साथ जाएंगे, मंदिर में देवता की स्थापना करेगे, तर माल खाएंगे, हां अछूत ने उसे छुआ हो। दक्षिणा लेंगें, इसमें कोई हर्ज नहीं, होना चाहिए। लेकिन अछूत मंदिर में नहीं जा सकता, उसने देवता अपवित्र हो जाएंगे। (पृ.448, वही)
पाखंडी ब्राह्मणों की खबर लेते हुए प्रेमचंद ने इसी लेख में आगे लिखा – ’इसी काषी में हजारों मदसेवी ब्राहमण और वह भी तिलकधारी निकल आएंगे।, फिर भी वे ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणों के घरों में चमारियां हैं, फिर भी उनके ब्राह्मणत्मव में बाधा नहीं आती, किन्तु अछूत नित्य स्नान करता हो, कितना ही आचारवान हो, वह मंदिर में नहीं जा सकता। क्या इसी नीति पर हिन्दू धर्म स्थिर रह सकता है? (पृ.449, वही) इन्ही वर्षों में डा. अंबेडकर ने घोषणा की थी कि उनका जन्म तो उनके वष में नही था, लेकिन वे एक हिन्दू के रूप में कभी नहीं मरेंगे और मृत्यु से दो महीने से कम समय पहले, लेकिन इस घोषणा के बीस वर्ष बाद 14 अक्टूबर 1956 को डा. अंबेडकर ने अकेले नहीं, अपने लाखों श्रद्धालुओं के साथ हिन्दू धर्म का त्याग करके बौद्ध धर्म में दीक्षा ली। डा. अंबेडकर ने हिन्दू धर्म में सुधार का बीस वर्ष तक इंतज़ार किया, लेकिन देष की आजादी के दस वर्ष बाद तक भी जब हिन्दू धर्म में सुधार होता उन्हें नज़र नहीं आया और अपनी सन्निकट मृत्यु के दरपेष उन्होंने अपना सार्वजनिक रूप से दिया वचन निभाया और भारत के दलित वर्ग के सामने भी नया पथ खोला, दर्भाग्य से जिस पथ पर डा. अंबेडकर के नाम लेवा दलित नेता भी नहीं चले।
5 दिसंबर 1932 को प्रकाषित अढाई पंक्तियों की टिप्पणी में पे्रमचंद ने नागपुर में हरिजन बालकों के लिए अलग छात्रावास बनाने के विरोध किया, क्योंकि इससेअछूतपन मिटेगा नहीं और दृढ़ होगा। इस नीति पर तो अब की भारत सरकार भी चल रही है।
30 जनवरी 1933 को मंदिर प्रवेष पर वाइसराय के रूख की आलोचना करते हुए प्रेमचंद ने लिखा किमद्रास कौंसिल में श्रीयुत सुब्बरायन कोमंदिर प्रवेषाधिकार संबंधी बिल पेष करने का अधिकार नहीं दिया। (पृ.418) ज़ाहिर है कि ब्रिटिष उपनिवेषवाद भारत मेंफूट डालो और राज करोनीति के तहत दलित समस्या का भी लाभ उठा रहा था।
असेंबलियों में दलितपृथक निर्वाचनक्यों चाहते थे, इसका एक उदाहरण तो प्रेमचंद ने अपनी 10 अप्रेल 1933 को प्रकाषित टिप्पणी में स्वयं ही दे दिया है। महात्मा गांधी के अनषन के दबाव के नीचे डा. अंबेडकर नेसम्मिलित निर्वाचन स्वीकार कर लिया, लेकिन बंबई कारपोरेषन के चुनाव में एक हरिजन श्री देवरूखकर को सवणर्् हिन्दुओं ने जैसे हराया उससे प्रेमचंद को तो ठेस पहुंची, लेकिन उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया कि पृथक निर्वाचन की बात सही थी। हालांकि उन्होंने इस टिप्पणी के अंत में चेतावनी जरूर दे दी– ’ अगर सजातीय हिन्दू इस तरह हरिजन उम्मीदवारों को हतोत्साहित करते रहे तो आपस में वैमनस्य और अंसतोष बढ़ेगा और पूना के समझौते का जो उद्देष्य था वह गायब हो जाएगा (पृ. 461, वही)
हरिजनों या दलितों के मंदिर प्रवेष के अधिकार और आंदोलन को लेकर पे्रमचंद ने इस बीच कई लेख लिखे। इसके इलावा 8 जनवरी 1934 को एक लंबा लेख क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं? उपषीर्षकटके पंथी पुजारी, पुरोहित और पंडे हिन्दू जाति के कलंक हैं, लिखा।
इस लेख में पे्रमचंद ने सांप्रदायिकता और जातिवाद को राष्ट्रवाद के घोर विरोधी बताते हुए लिखा
हिन्दू जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल हैं, जो एक विषाल जोंक की भांति उसका खून चूस रहा है और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है। राष्ट्रीयता की पहली शर्त है, समाज में साम्य भाव का दृढ़ होना। उसके बिना राष्ट्रीयता की कल्पना नहीं की जाा सकती। (पृ. 471, वही)
राष्ट्रीयता की अपनी अवधारणा की कुछ और व्याख्या करते हुए प्रेमचंद इसी लेख में आगे कहते है – ’हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हें, उसमें तो जन्मगत वर्णो की गंध तक होगी वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें कोई ब्राह्मण होगा, हरिजन कायस्थ क्षत्रिय। उसमें सभी भारतवासी होगे, सभी ब्राह्मण होगे या सभी हरिजन होगे। (पृ. 473)
इस लेख में पे्रमचंद ने पं. ज्योतिप्रसाद निर्मल द्वारा अपने उपर लगाए आरोपों का उत्तर भी दिया है – ’निर्मल जी हमें ब्राह्मण द्वेषी बताकर संतुष्ट नहीं हुए उन्होंने हमें हिन्दू द्रोही भी सिद्ध किया है, क्योंकि हमने अपनी रचनाओं में मुसलमानों को अच्छे रूप में दिखाया है। तो क्या आप चाहते हैं कि हम मुसलमानों को भी उसी तरह चित्रित करें जिस तरह पुरोहितों और पाखंडियों को करते है।? हमारा आदर्ष सदैव से यह रहा है कि जहां धूर्तता और पाखंड और सबलों द्वारा निर्बलों पर अत्याचार देखों, उसको समाज के सामने रखो, चाहे हिन्दू हो, पंडित हो, बाबू हो, मुसलमान हो, या कोई हो। इसलिए हमारी कहानियों में आपको पदाधिकारी, महाजन, वकील और पुजारी गरीबों का खून चूसते हुए मिलेंगे और गरीब किसान मजदूर, अछूत और दरिद्र उनके आघात सहकर भी अपने धर्म और मनुष्यता को हाथ से जाने देंगे, क्योंकि हमने उन्हीं में सबसे ज्यादा सच्चाई और सेवाभाव पाया है। (पृ. 475, वही)
लेख के अंत में प्रेमचंद एक बार फिर इस बात पर जोर देते हैं कि राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्णवयवस्था, ऊंचनीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है।‘ (पृ. 476, वही)
8 जनवरी 1934 को प्रकाषित प्रेमचंद का यह लेख उनके दलित विमर्ष पर भविष्य की भारतीय समाज व्यवस्था के अवधारणा की समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वास्तव में इस लेख में दलित समस्या संबंधी प्रेमचंद के विचार महात्मा गांधी के विचारों से आगे बढ़े हुए दिखाई देते हैं। विषेषत भारतीय समाज व्यवस्था के नए संभावित रूप का उनका स्वप्न प्रगतिषील विचारों वर्ग दृष्टि की झलक देता है।
छूत अछूतशीर्षक से लेखमाला की अंतिम टिप्पणी 14 मई 1934 को प्रकाषित है जो एक साथ कटु और मार्मिक दोनों है शीर्षक है – ’इस हिमाकत की कोई हद है?‘ – शुरू का वाक्य है
छूआछूत और जातपांत का भेद हिन्दू समाज मे इतना बद्धमूल हो गया है कि शायद उसका सर्वनाष करके ही छोड़े।यह पूरी टिप्पणी यहां पे्रमचंद के शब्दों में ही दर्ज है -’खबर है कि किसी स्थान में एक कुलीन हिन्दू स्त्री कुएं पर पानी भरने गई। संयोगवष कुएं में गिर पड़ी। बहुत से लोग तुरन्त कुएं पर जमा हो गए और उस औरत को बाहर निकालने का उपाय सोचने लगे, मगर किसी में इतना साहस नहीं था कि कुएं में उतर जाता। वहां कई हरिजन भी जमा हो गए थे। वे कुएं में जाकर उस स्त्री को निकाल लाने को तैयार हुए, लेकिन हरिजन कुएं में कैसे जा सकता था। पानी अपवित्र हो जाता, नतीजा यह हुआ कि अभगिनी स्त्री कुएं में मर गयी।
प्रेमचंद की निष्कर्ष वाक्य है
क्या छूत का भूत कभी हमारे सिर से उतरेगा?
वास्तब में प्रेमचंद के विचारों में गांधीवाद से मोहभंग 1934 के आसपास ही होना शुरू हुआ था और 1936 में तो वह पूरी तरह से उनसे मुक्त हो गए थे। उसका बहुत बड़ा कारण प्रेमचंद का भारतीय साहित्य परिषद कोहंससौंपने और किए उनसे निराष होकर वापिस लेने में निहित है, जिसके तुरंत बाद वे गंभीर रूप् से बीमार पड़े और उन्हें अपने विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति का अवसर ही नही मिल पाया, थोड़ी बहुत अभिव्यक्ति केवल अधूरे उपन्यास मंगलसूत्रमें ही कर पाए। इस प्रंसग को मदन गोपाल ने प्रेमचंद की अपनी जीवनीकलम का मजदूरमें संक्षेप में दर्ज किया है।
जैनेन्द्र कुमार के सुझाव पर 1935 में भारतीय साहित्य परिषद मेंहंसको अपना मुख पत्र बनाने का प्रस्ताव किया, जिसमें सभी भाषाओं के साहित्य का हिन्दी अनवाद छपना था। प्रेस को हो रहे लगातार घाटे के कारण पे्रमचंद ने सोचा था कि परिषदहंसको उनके ही प्रेस में छपवाती रहेगी, लेकिन परिषद ने उसे सस्ता साहित्य मंडल प्रेस दिल्ली से छपवाने का निर्णय किया। हंसके संपादक रूप में पे्रमचंद के साथ कन्हैयालाल माणिकलाल मुंषी का नाम जुड़ा। अक्टूबर 1935 सेहंसनए रूप में निकला।हंसके 22 सदस्य सलाहकार मंडल में पहला नाम महात्मा गांधी का था। भारतीय साहित्य परिषद की कार्यकारिणी के सभापति भी महात्मा गांधी ही थे।
इधर प्रेमचंद जून 1936 में घातक रूप से बीमार पड़े और जून और जुलाई 1936 केहंसमें सेठ गोविंदादास के नाटकस्वातंत्र्य सिद्धान्तनाटक के प्रकाषन पर अंग्रेज सरकार ने एक हजार रूपये की ज़मानत मांग ली। भारतीय साहित्य परिषद ने इतने बड़े बड़े व्यक्तियों के कार्यकारिणी में होते हुए, जिनके रहते किसी तरह भी पैसे की कमी हो सकती थी, ’हंसकी जमानत राषि जमा करने से इन्कार कर दिया। 12-8-1936 कोहंसकी ज़मानत राषि भर पाने सेहंसका प्रकाषन बंद करने की घोषणा प्रेमचंद के ही नाम से की तथा साथ ही भारतीय साहित्य परिषद सेहंसके संबंध विच्छेद की भी, जिसके लिए उन्होंनेसस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली का पता परिषद के साथ पत्र व्यवहार के लिए दिया। पहले से ही गंभीर रूप से बीमार प्रेमचंद के लिए यह भयानक आघात था, बिना उनसे पूछे उनके नाम से यह घोषणा की गई। उनके परिवार और मित्रों ने पे्रमचंद की रूग्ण दषा औरहंसके प्रति पे्रमचंद के लगाव को देखते हुए यह ज़मानत राषि जमा करवाई।हंसको प्रेमचंद अपना तीसरा पुत्र मानते थे।
जीवन में गांधीवादियों के प्रेमचंद के साथ इस अमानुषिक कृत्य ने वास्तव में पे्रमचंद को निर्णायक रूप से गांधी ओर गांधीवाद से अलग किया। सितंबर मेंहंसको दोबारा निकालते हुए इसे प्रगतिषील, अन्तप्र्रान्तीय और अन्तर्राष्ट्रीय रूप देते हुएआलोचनात्मक, उन्नतिमूलक और विवेक प्रणीतसाहित्य का पूर्ण समर्थक और संदेषवाहक बनाया गया। जैनेन्द्र कुमार और श्री भारतीय को प्रेमचंद के अतिरिक्त संपादक बनाया गया।
हंसके इसी अंक मेंमहाजनी सभ्यतालेख छपा जो उनके चिंतन में प्रगतिषील दिषा में निर्णायक मोड का प्रतिविंम्ब है।दो बहनेंकहानी में भी इन विचारों की झलक मिलती है। लेकिन प्रेमचंद के चिंतन में यह निर्णायक मोड़ उस घड़ी उन परिस्थितियों में आया, जब वे मृत्युषैय्या पर थे।हंसका अक्टूबर 1936 अंक शायद उनके जीवन काल में निकल ही नहीं पाया। लेकिन प्रेमचंद ने मृत्युषैय्या पर लेटे हुए भी भारतीय साहित्य परिषद द्वारा 12-8-1936 को जो क्रूरता उनके साथ की गई, उसका हिसाब सितंबर अंक में चुकता करके ही संसार से विदा ली। जीवन के अंतिम क्षणों में उन्हें ऐसे आघात लगते तो शायद वे कुछ और समय जी जाते और अपनी वैचारिक प्रखरता प्रतिबद्धता को और स्पष्ट रूप में अभिव्यक्त कर जाते।
कुल मिलाकर पे्रमचंद का जीवन, व्यक्तित्व चिंतन एक निरंतर संघर्ष की गाथा है, जो गुण के स्तर पर उच्च से उच्चतर की ओर गया है। उनके चिंतन और लेखन का मूलतत्व मानववाद और विवेकषील जनतांत्रिक भावना थी। उनके सृजनात्मक लेखन में दलित विमर्ष इतना प्रखर है कि उनकी जाति संबंधी जानकारी हो तो उसे किसी दलित पृष्ठभूमि के लेखक की रचना भी समझा जा सकता है। उनके चिंतनपरक लेखन में व्यक्त दलित विमर्ष गांधी और गांधीवाद से प्रभावित है, लेकिन वह इन सीमाओं के पार छलांग लगाने की चेष्टाएं करता रहता है। मृत्युषैय्या परहंसके क्रूर और कटु अनुभव के बाद उनकी चेतना का जो स्वरूप विकसित हो रहा था, हिन्दी और अन्यभाषी पाठक उससे वंचित रह गए, लेकिन उसका अंतिम स्वरूप निष्चय ही उच्चतर मानववादी या भगत सिंह के विकसित हो रहे समाजवादी चिंतन जैसा ही होता। ज़ाहिर है उससे उनका दलित विमर्ष भी और अधिक प्रखर निखरा हुआ होता।